श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 15: धेनुकासुर का वध  »  श्लोक 44

 
श्लोक
तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयो: पुत्रवत्सले ।
यथाकामं यथाकालं व्यधत्तां परमाशिष: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
तयो:—दोनों; यशोदा-रोहिण्यौ—यशोदा तथा रोहिणी (कृष्ण तथा बलराम की माताओं) ने; पुत्रयो:—पुत्रों को; पुत्र वत्सले—अपने पुत्रों के स्नेहसिक्त; यथा-कामम्—अपनी अपनी इच्छाओं के अनुरूप; यथा-कालम्—परिस्थितियों के अनुरूप; व्यधत्ताम्—प्रस्तुत किया; परम-आशिष:—उत्तम भेंटें ।.
 
अनुवाद
 
 माता यशोदा तथा रोहिणी ने अपने दोनों पुत्रों के प्रति अत्यधिक स्नेह दर्शाते हुए उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार तथा समयानुकूल उत्तमोत्तम वस्तुएँ प्रदान कीं।
 
तात्पर्य
 परमाशिष: शब्द प्रेममयी माताओं के आशीर्वाद को सूचित करता है, जिसके अन्तर्गत उत्तम भोजन, सुन्दर वस्त्र, आभूषण, खिलौने तथा स्थायी स्नेह निहित हैं। यथाकामं यथाकालम् यह बतलाते हैं कि यद्यपि यशोदा तथा रोहिणी ने कृष्ण तथा बलराम की सारी इच्छाएँ पूरी कर दीं किन्तु साथ ही उन्होंने अपने पुत्रों के कार्यकलापों को भी नियमित बनाया। दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपने पुत्रों के लिए उत्तम भोजन तैयार किया किन्तु साथ ही उन्होंने इसका भी ध्यान रखा कि वे समय से भोजन करें। इसी तरह उनके द्वारा उचित समय पर खेलने और उचित समय से सोने का भी ध्यान रखा। यथाकामम् का अर्थ यह नहीं हैं कि माताओं ने अपने पुत्रों को मनमाना करने की छूट दे दी थी अपितु उन्होंने शिष्ट ढंग से अपने पुत्रों पर आशीष की वर्षा की थी।
श्रील सनातन गोस्वामी टीका करते हैं कि माताएँ अपने पुत्रों को इतना अधिक प्यार करती थीं कि जब वे उनका आलिंगन करतीं तो ठीक से देखतीं कि उनके सारे अंग स्वस्थ तथा पुष्ट तो हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥