श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 15: धेनुकासुर का वध  »  श्लोक 6

 
श्लोक
एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं
गायन्त आदिपुरुषानुपथं भजन्ते ।
प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या
गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
एते—ये; अलिन:—भौंरे; तव—आपका; यश:—कीर्ति; अखिल-लोक—समस्त जगतों के लिए; तीर्थम्—तीर्थस्थान; गायन्त:—गुणगान कर रहे हैं; आदि-पुरुष—हे आदि भगवान्; अनुपथम्—मार्ग में आपका अनुसरण करते हुए; भजन्ते—पूजा कर रहे हैं; प्राय:—अधिकांशत:; अमी—ये; मुनि-गणा:—मुनि जन; भवदीय—आपके भक्तों में; मुख्या:—अतीव घनिष्ठ; गूढम्—छिपाया हुआ; वने—जंगल में; अपि—यद्यपि; न जहति—नहीं छोड़ते; अनघ—हे निष्पाप; आत्म-दैवम्—अपने आराध्य देव को ।.
 
अनुवाद
 
 हे आदिपुरुष, ये भौंरे अवश्य ही महान् मुनि तथा आपके परम सिद्ध भक्त होंगे क्योंकि ये मार्ग में आपका अनुसरण करते हुए आपकी पूजा कर रहे हैं और आपके यश का कीर्तन कर रहे हैं, जो सम्पूर्ण जगत के लिए स्वयं तीर्थस्थल हैं। यद्यपि आपने इस जंगल में अपना वेश बदल रखा है किन्तु हे अनघ, वे अपने आराध्यदेव, आपको छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में गूढम् शब्द महत्त्वपूर्ण है। यह इंगित करता है कि यद्यपि कृष्ण या बलराम के रूप में भगवान् इस भौतिक जगत में सामान्य व्यक्ति जैसे लगते हैं किन्तु बड़े-बड़े ऋषि मुनि भगवान् को परब्रह्म के रूप में हमेशा पहचान लेते हैं। ईश्वर के सारे दिव्य स्वरूप सच्चिदानन्दमय हैं—
हमारे भौतिक शरीरों के सर्वथा विपरीत जो कि अस्थायी तथा दुख एवं अज्ञान से पूर्ण होते हैं। तीर्थ शब्द का एक अर्थ है “भौतिक संसार पार करने का साधन।” भगवान् के यश के श्रवण या कीर्तन मात्र से मनुष्य तुरन्त ही भव-सागर के परे आध्यात्मिक पद को प्राप्त होता है। इसीलिए भगवान् के दिव्य यश का वर्णन यहाँ प्रत्येक मानव के लिए तीर्थ के रूप में हुआ है। गायन्त: शब्द सूचित करता है कि मुनिगण अपना मौन-व्रत भंग करके एवं अन्य निजी कार्य का त्याग करके भगवान् के कार्यकलापों का गुणगान करते हैं। असली मौन का अर्थ है व्यर्थ न बोलना, अपनी वाणी को भगवान् की प्रेमाभक्ति से सम्बन्धित ध्वनि तथा बातचीत तक ही सीमित रखना।

अनघ शब्द बतलाता है कि भगवान् कभी कोई पाप कर्म या अपराध नहीं करते। यह शब्द इस बात को भी सूचित करता है कि वे अपने निष्ठावान भक्त द्वारा अकस्मात् किये गये पाप या अपराध को तुरन्त क्षमा कर देते हैं। इस श्लोक के विशेष संदर्भ में अनघ शब्द यह सूचित करता है कि बलराम जी लगातार पीछा करने वाले भौंरों से तनिक भी विचलित नहीं हो रहे थे। उन्होंने उन्हें यह आशीर्वाद दिया, “हे भौंरो! मेरे गोपनीय कुंज में आओ और इसकी सुगन्धि का आनन्द लो।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥