श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 13-15

 
श्लोक
तानालक्ष्य भयोद्विग्ना गोपा नन्दपुरोगमा: ।
विना रामेण गा: कृष्णं ज्ञात्वा चारयितुं गतम् ॥ १३ ॥
तैर्दुर्निमित्तैर्निधनं मत्वा प्राप्तमतद्विद: ।
तत्प्राणास्तन्मनस्कास्ते दु:खशोकभयातुरा: ॥ १४ ॥
आबालवृद्धवनिता: सर्वेऽङ्ग पशुवृत्तय: ।
निर्जग्मुर्गोकुलाद् दीना: कृष्णदर्शनलालसा: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तान्—उन संकेतों को; आलक्ष्य—देखकर; भय-उद्विग्ना:—भय से विचलित; गोपा:—ग्वाले; नन्द-पुर:-गमा:—नन्द महाराज इत्यादि; विना—रहित; रामेण—बलराम के; गा:—गौवें; कृष्णम्—कृष्ण को; ज्ञात्वा—जानकर; चारयितुम्—चराने के लिए; गतम्—गया हुआ; तै:—उनसे; दुर्निमित्तै:—अपशकुनों से; निधनम्—विनाश; मत्वा—मानकर; प्राप्तम्—प्राप्त किया; अतत्- विद:—उनके ऐश्वर्य को न जानने से; तत्-प्राणा:—उन्हें अपना प्राण मानकर; तत्-मनस्का:—उन्हीं में लीन मन; ते—वे; दु:ख—दुख; शोक—शोक; भय—तथा भय से; आतुरा:—विह्वल; आ-बाल—बच्चों समेत; वृद्ध—बूढ़े लोग; वनिता:—तथा स्त्रियाँ; सर्वे—सभी; अङ्ग—हे राजा परीक्षित; पशु-वृत्तय:—जिस तरह वत्सल गाय अपने बछड़े के साथ करती है; निर्जग्मु:— बाहर चले गये; गोकुलात्—गोकुल से; दीना:—दीन समझकर; कृष्ण-दर्शन—कृष्ण को देखने के लिए; लालसा:—उत्सुक, लालायित ।.
 
अनुवाद
 
 इन अपशकुनों को देखकर नन्द महाराज तथा अन्य ग्वाले भयभीत थे क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि उस दिन कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के बिना गाय चराने गये थे। चूँकि उन्होंने कृष्ण को अपना प्राण मानते हुए अपने मन उन्हीं पर वार दिये थे क्योंकि वे उनकी महान् शक्ति तथा ऐश्वर्य से अनजान थे। इस तरह उन्होंने इन अपशकुनों से यह अर्थ निकाला कि कृष्ण की मृत्यु हो गई है और वे दु:ख, पश्चात्ताप तथा भय से अभिभूत हो गये थे। बालक, स्त्रियाँ तथा वृद्ध पुरुषों समेत वृन्दावन के सारे निवासी कृष्ण को उसी तरह मानते थे जिस तरह गाय अपने निरीह नवजात बछड़े को मानती है। इस तरह ये दीन-दुखी लोग उन्हें ढूँढऩे के इरादे से गाँव से बाहर दौड़ पड़े।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥