श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 25

 
श्लोक
तं जिह्वया द्विशिखया परिलेलिहानं
द्वे सृक्‍वणी ह्यतिकरालविषाग्निद‍ृष्टिम् ।
क्रीडन्नमुं परिससार यथा खगेन्द्रो
बभ्राम सोऽप्यवसरं प्रसमीक्षमाण: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको, कालिय को; जिह्वया—अपनी जीभ से; द्वि-शिखया—दोमुही; परिलेलिहानम्—बारबार चाटता हुआ; द्वे—दो; सृक्वणी—होंठ; हि—निस्सन्देह; अति-कराल—अत्यन्त भयावने; विष-अग्नि—विषैली अग्नि से पूर्ण; दृष्टिम्—जिसकी दृष्टि; क्रीडन्—खेलती हुई; अमुम्—उसको; परिससार—चारों ओर घूम गई; यथा—जिस तरह; खग-इन्द्र:—पक्षिराज गरुड़; बभ्राम—चारों ओर घूमा; स:—कालिय; अपि—भी; अवसरम्—(प्रहार करने का) अवसर; प्रसमीक्षमाण:—ध्यानपूर्वक देखते हुए, की ताक में ।.
 
अनुवाद
 
 कालिय बारम्बार अपनी दोमुही जीभ से अपने होंठों को चाटता और विषैली विकराल अग्नि से पूर्ण अपनी दृष्टि से कृष्ण को घूरता जा रहा था। किन्तु कृष्ण ने मानो खेल-खेल में ही उसका उसी तरह चक्कर लगाया जिस तरह गरुड़ सर्प से खिलवाड़ करता है। प्रतिक्रिया के रूप में, कालिय भी उनके साथ साथ घूमता जाता था और भगवान् को काटने का अवसर ढूँढ़ रहा था।
 
तात्पर्य
 कृष्ण इतनी चतुराई से कालिय के चारों ओर घूम रहे थे कि कालिय को उसे काटने का अवसर ही
नहीं मिल पाया। इस तरह श्रीकृष्ण की दिव्य चंचलता के द्वारा सर्प पराजित हो गया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥