श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 4

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
कालिन्द्यां कालियस्यासीद् ह्रद: कश्चिद् विषाग्निना ।
श्रप्यमाणपया यस्मिन् पतन्त्युपरिगा: खगा: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कालिन्द्याम्—यमुना नदी के भीतर; कालियस्य—कालिय नाग का; आसीत्—था; ह्रद:—झील, सरोवर, कुंड; कश्चित्—कोई; विष—उसके विष की; अग्निना—अग्नि से; श्रप्यमाण—गर्मी से उबलकर; पया:—इसका जल; यस्मिन्—जिसमें; पतन्ति—गिर पड़ते थे; उपरि-गा:—ऊपर से जाते हुए; खगा:—पक्षीगण ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कालिन्दी (यमुना) नदी के भीतर एक सरोवर (कुंड) था जिसमें कालिय नाग रह रहा था जिसके अग्नि-तुल्य विष से उसका जल निरन्तर उबलता रहता था। इस तरह से उत्पन्न भाप इतनी विषैली होती थी कि दूषित सरोवर के ऊपर से उडऩेवाले पक्षी उसमें गिर पड़ते थे।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में आचार्यों की व्याख्या है कि कालिय कुंड (सरोवर) नदी की मुख्य धारा से अलग स्थित
था अन्यथा यमुना का जल मथुरा जैसे नगरों तथा उसके आगे के स्थानों में भी विषैला हो गया होता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥