श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 49

 
श्लोक
त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो
गुणैरनीहोऽकृतकालशक्तिधृक् ।
तत्तत्स्वभावान् प्रतिबोधयन् सत:
समीक्षयामोघविहार ईहसे ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—आप; हि—निस्सन्देह; अस्य—इस ब्रह्माण्ड के; जन्म-स्थिति-संयमान्—सृजन, पालन तथा संहार; विभो—हे सर्वशक्तिमान; गुणै:—प्रकृति के गुणों द्वारा; अनीह:—किसी भी भौतिक प्रयास में निहित न होते हुए भी; अकृत—अनादि; काल-शक्ति—काल की शक्ति के; धृक्—धारण करनेवाले; तत्-तत्—प्रत्येक गुण के; स्व-भावान्—लक्षणों को; प्रतिबोधयन्—जाग्रत करते हुए; सत:—सुप्त अवस्था में रह रहे; समीक्षया—अपनी चितवन से; अमोघ-विहार:—अमोघ क्रीड़ाओं वाले; ईहसे—आप कर्म करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे सर्वशक्तिमान प्रभु, यद्यपि आपके भौतिक कर्म में फँसने का कोई कारण नहीं है, फिर भी आप इस ब्रह्माण्ड के सृजन, पालन तथा संहार की व्यवस्था करने के लिए अपनी शाश्वत कालशक्ति के माध्यम से कर्म करते हैं। इसे आप सृजन के पूर्व सुप्त पड़े प्रकृति के प्रत्येक गुण के विशिष्ट कार्य को जाग्रत करते हुए सम्पन्न करते हैं। ब्रह्माण्ड-नियंत्रण के इन सारे कार्यों को आप खेल खेल में केवल अपनी चितवन से पूर्णतया सम्पन्न कर देते हैं।
 
तात्पर्य
 संशयवादी प्रश्न कर सकते हैं कि परमेश्वर ने जन्म, पालन तथा मृत्यु से भरी-पूरी भौतिक जगत की सृष्टि क्यों की। यहाँ पर नागपत्नियाँ संकेत करती हैं कि भगवान् की लीलाएँ अमोघ अर्थात् त्रुटि-रहित हैं। वास्तव में कृष्ण यही चाहते हैं कि सारे बद्धजीव उनके साथ उनके दिव्य धाम में रहें किन्तु वे भुलक्कड़ जीवात्माएँ जो ईश्वर के इस प्रेम-सम्बन्ध को द्वेष की दृष्टि से देखती हैं उन्हें भौतिक जगत में जाना पड़ता
है और काल की स्थितियाँ भोगनी पड़ती हैं। भाग्यशाली बद्धजीवों को भगवान् के प्रिय सेवकों के रूप में अपने वास्तविक पद का स्मरण कराकर सतर्क कर दिया जाता है, तो भगवान् उनके हृदय के भीतर से उन्हें भगवद्धाम वापस आने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जहाँ काल अनुपस्थित रहता है और जहाँ दृश्य जगत के सृजन तथा संहार जैसे विचलित करनेवाले नाटकीय कृत्य शाश्वत एवं आनन्दमय जगत द्वारा पछाड़ दिये जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥