श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 65-67

 
श्लोक
दिव्याम्बरस्रङ्‌मणिभि: परार्ध्यैरपि भूषणै: ।
दिव्यगन्धानुलेपैश्च महत्योत्पलमालया ॥ ६५ ॥
पूजयित्वा जगन्नाथं प्रसाद्य गरुडध्वजम् ।
तत: प्रीतोऽभ्यनुज्ञात: परिक्रम्याभिवन्द्य तम् ॥ ६६ ॥
सकलत्रसुहृत्पुत्रो द्वीपमब्धेर्जगाम ह ।
तदैव सामृतजला यमुना निर्विषाभवत् ।
अनुग्रहाद् भगवत: क्रीडामानुषरूपिण: ॥ ६७ ॥
 
शब्दार्थ
दिव्य—दैवी; अम्बर—वस्त्र; स्रक्—माला; मणिभि:—तथा मणियों से; पर-अर्ध्यै:—अत्यन्त मूल्यवान; अपि—भी; भूषणै:—आभूषणों से; दिव्य—दैवी; गन्ध—सुगन्धि; अनुलेपै:—तथा लेप से; च—तथा; महत्या—सुन्दर; उत्पल—कमल की; मालया—माला से; पूजयित्वा—पूजकर; जगत्-नाथम्—जगत के स्वामी को; प्रसाद्य—तुष्ट करके; गरुड-ध्वजम्— जिसकी ध्वजा में गरुड़ चिह्न अंकित है, उसे; तत:—तब; प्रीत:—सुख का अनुभव करते हुए; अभ्यनुज्ञात:—जाने की अनुमति दिया जाकर; परिक्रम्य—परिक्रमा करके; अभिवन्द्य—नमस्कार करके; तम्—उन्हें; स—सहित; कलत्र—अपनी पत्नी; सुहृत्—मित्रगण; पुत्र:—तथा बच्चे; द्वीपम्—द्वीप को; अब्धे:—समुद्र में; जगाम—चला गया; ह—निस्सन्देह; तदा एव—उसी क्षण; स-अमृत—अमृत तुल्य; जला—जल वाली; यमुना—यमुना नदी; निर्विषा—विष से रहित; अभवत्—हो गई; अनुग्रहात्—कृपा से; भगवत:—भगवान् की; क्रीडा—क्रीड़ाओं के लिए; मानुष—मनुष्य जैसा; रूपिण:—रूप धारण करके ।.
 
अनुवाद
 
 कालिय ने सुन्दर वस्त्र, मालाएँ, मणियाँ तथा अन्य मूल्यवान आभूषण, दिव्य सुगन्धियाँ तथा लेप और कमलफूलों की बड़ी माला भेंट करते हुए जगत के स्वामी की पूजा की। इस तरह गरुड़-ध्वज भगवान् को प्रसन्न करके कालिय को सन्तोष हुआ। जाने की अनुमति पाकर कालिय ने उनकी परिक्रमा की और उन्हें नमस्कार किया। तब अपनी पत्नियों, मित्रों तथा बच्चों को साथ लेकर वह समुद्र में स्थित अपने द्वीप चला गया। कालिय के जाते ही यमुना नदी अपने मूल रूप में, विष से विहीन तथा अमृतोपम जल से पूर्ण हो गई। यह सब उन भगवान् की कृपा से सम्पन्न हुआ जो अपनी लीलाओं का आनन्द मनाने के लिए मनुष्य के रूप में प्रकट हुए थे।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस श्लोक की विशद टीका की है। मणिभि: शब्द की व्याख्या करने के लिए आचार्य ने रूप गोस्वामी कृत श्री राधा-कृष्ण गणोद्देश दीपिका से निम्नलिखित उद्धरण दिया है—
कौस्तुभाख्यो मणिर्येन प्रविश्य ह्रदमौरगम्।

कालियप्रेयसिवृन्दहस्तैरात्मोपहारित: ॥

“भगवान् ने अपनी कौस्तुभ मणि को सर्प के सरोवर में प्रविष्ट करा दिया था और फिर कालिय की पत्नियों से उसे स्वयं को अर्पित कराया था।” दूसरे शब्दों में, चूँकि भगवान् कृष्ण सामान्य व्यक्ति का सा आचरण करना चाहते थे अतएव उन्होंने दिव्य कौस्तुभ मणि को अदृश्य करके कालिय के कोष में प्रविष्ट करा दिया। तत्पश्चात् जब अनेक मणियों तथा आभूषणों से कालिय द्वारा पूजा करने का उचित समय आया तो भगवान् की दिव्य चालाकी से अनजान सर्प की पत्नियों ने वह कौस्तुभ मणि यह सोचकर कि यह उनके पास रखी एक सामान्य मणि है भगवान् को भेंट कर दी।

आचार्य ने यह भी टीका की है कि भगवान् कृष्ण को गरुड़ध्वज (वे जिनकी पताका उनके वाहन गरुड़ के निशान से अंकित है) इसलिए कहा गया है कि कालिय भी कृष्ण का वाहन बनना चाह रहा था। गरुड़ तथा सर्पगण मूलत: भाई भाई हैं अत: कालिय कृष्ण को यह बतलाना चाह रहा था “यदि आप कहीं दूर जाना चाहें तो मुझे भी अपना निजी वाहन मानें। मैं आपके दास का दास हूँ और पलक झपकते ही मैं करोड़ों योजन की यात्रा कर सकता हूँ।” इस तरह पुराणों में बतलाया गया है कि भगवान् कृष्ण अपनी शाश्वत लीलाओं के चक्र में, जब कंस उन्हें मथुरा आने का आदेश देते हैं, तो वे कभी कभी कालिय पर सवार होकर जाते हैं।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के अन्तर्गत “कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा” नामक सोलहवें अध्याय के श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के विनीत सेवकों द्वारा रचित तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥