श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 17: कालिय का इतिहास  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
नागालयं रमणकं कथं तत्याज कालिय: ।
कृतं किं वा सुपर्णस्य तेनैकेनासमञ्जसम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—राजा ने कहा; नाग—सर्पों का; आलयम्—वासस्थान; रमणकम्—रमणक नामक द्वीप; कथम्—क्यों; तत्याज—त्याग दिया; कालिय:—कालिय ने; कृतम्—वाध्य किया गया; किम् वा—तथा क्यों; सुपर्णस्य—गरुड़ की; तेन— उससे, कालिय से; एकेन—अकेले; असमञ्जसम्—शत्रुता ।.
 
अनुवाद
 
 [इस प्रकार कृष्ण ने कालिय की प्रताडऩा की उसे सुनकर] राजा परीक्षित ने पूछा: कालिय ने सर्पों के निवास रमणक द्वीप को क्यों छोड़ा और गरुड़ उसीका से इतना विरोधी क्यों बन गया?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥