श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 17: कालिय का इतिहास  »  श्लोक 2-3

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
उपहार्यै: सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलि: ।
वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ्‍‍‍‍‍‍निरूपित: ॥ २ ॥
स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागा: पर्वणि पर्वणि ।
गोपीथायात्मन: सर्वे सुपर्णाय महात्मने ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; उपहार्यै:—भेंट पाने के पात्र; सर्प-जनै:—सर्प जाति के द्वारा; मासि मासि— हर महीने; इह—यहाँ (नागालय में); य:—जो; बलि:—भेंट; वानस्पत्य:—वृक्ष के नीचे; महा-बाहो—हे बलिष्ट भुजाओं वाले परीक्षित; नागानाम्—सर्पों के लिए; प्राक्—पहले से; निरूपित:—निश्चित; स्वम् स्वम्—अपना अपना; भागम्—अंश; प्रयच्छन्ति—भेंट करते; नागा:—सर्पगण; पर्वणि पर्वणि—मास में एक बार; गोपीथाय—रक्षा हेतु; आत्मन:—अपनी अपनी; सर्वे—सभी; सुपर्णाय—गरुड़ को; महा-आत्मने—बलशाली ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : गरुड़ द्वारा खाये जाने से बचने के लिए सर्पों ने पहले से उससे यह समझौता कर रखा था कि उनमें से हर सर्प मास में एक बार अपनी भेंट लाकर वृक्ष के नीचे रख जाया करेगा। इस तरह हे महाबाहु परीक्षित, प्रत्येक मास हर सर्प अपनी रक्षा के मूल्य के रूप में विष्णु के शक्तिशाली वाहन को अपनी भेंट चड़ाया जाया करता था।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी ने इस श्लोक की एक दूसरी भी व्याख्या दी है। उपहार्यै शब्द का एक दूसरा अर्थ भी किया जा सकता है “जिन्हें खाया जाना है उनके द्वारा।” इसी तरह सर्प-जनै का अर्थ है “वे मनुष्य जो सर्प जाति के अधीन थे या उससे सम्बन्धित थे।” इस पाठ के अनुसार, मनुष्यों का एक समुदाय सर्पों के अधीन हो गया था और उनके द्वारा खाये जा सकते थे। इससे बचने
के लिए ये लोग सर्पों को मासिक भेंट चढ़ाते थे जिसमें से एक अंश वे गरुड़ को देते थे ताकि वह उन्हें न खा जाय। यहाँ जो विशेष अर्थ प्रस्तुत किया गया है, वह श्रील सनातन गोस्वामी की टीका तथा श्रील प्रभुपाद द्वारा ‘भगवान् कृष्ण’ नामक ग्रन्थ के पर आधारित है। हर हालत में, सारे आचार्यों में मतैक्य है कि सर्पों ने गरुड़ से सुरक्षा मोल ले रखी थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥