श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 17: कालिय का इतिहास  »  श्लोक 8

 
श्लोक
सुपर्णपक्षाभिहत: कालियोऽतीव विह्वल: ।
ह्रदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
सुपर्ण—सुपर्ण के; पक्ष—पंख से; अभिहत:—चोट खाकर; कालिय:—कालिय; अतीव—अत्यधिक; विह्वल:—बेचैन; ह्रदम्—सरोवर में; विवेश—घुस गया; कालिन्द्या:—यमुना नदी के; तत्-अगम्यम्—गरुड़ द्वारा थाह पा सकने में अक्षम; दुरासदम्—घुसने में कठिन ।.
 
अनुवाद
 
 गरुड़ के पंख की चोट खाने से कालिय अत्यधिक बेचैन हो उठा अत: उसने यमुना नदी के निकटस्थ सरोवर में शरण ले ली। गरुड़ इस सरोवर में नहीं घुस सका। निस्सन्देह, वह वहाँ तक पहुँच भी नहीं सका।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥