श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 18: भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध  »  श्लोक 14

 
श्लोक
क्‍वचिद्ब‍िल्वै: क्‍वचित्कुम्भै: क्‍वचामलकमुष्टिभि: ।
अस्पृश्यनेत्रबन्धाद्यै: क्‍वचिन्मृगखगेहया ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कभी; बिल्वै:—बेल के फल से; क्वचित्—कभी; कुम्भै:—कुम्भ फलों से; क्वच—तथा कभी; आमलक- मुष्टिभि:—मुट्ठी भर आँवलों से; अस्पृश्य—छुई-छुऔअल खेल; नेत्र-बन्ध—आँख मिचौनी में एक दूसरे को पहचानने की कोशिश करते हुए; आद्यै:—इत्यादि द्वारा; क्वचित्—कभी; मृग—पशु; खग—तथा पक्षियों की तरह; ईहया—नकल करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 ग्वालबाल कभी बिल्व या कुम्भ फलों से खेलते और कभी मुट्ठी में आमलक फलों को लेकर खेलते। कभी वे एक दूसरे को छूने का या आँख मिचौनी के समय किसी को पहचानने का खेल खेलते तो कभी वे पशुओं तथा पक्षियों की नकल उतारते।
 
तात्पर्य
 श्रील सनातन गोस्वामी व्याख्या करते हैं कि आद्यैशब्द एक दूसरे का पीछा करने तथा पुल बनाने जैसे खेलों का संकेत करता है। दोपहर में जब कृष्ण विश्राम करते होते तो एक अन्य लीला होती थी। पास से गीत गाती तरुण गोपिकाएँ गुजरतीं तो कृष्ण के मित्र उनसे दूध का भाव पूछने का बहाना करते। तब ये लडक़े उनका दही तथा अन्य वस्तुएँ चुरा लेते और भाग जाते। कृष्ण, बलराम तथा उनके मित्र नावों द्वारा नदी पार करने का भी खेल खेला करते थे।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इसके आगे व्याख्या करते हैं कि कुछ बालक फलों को हवा में उछाल कर दूसरे फलों को फेंक कर उन्हें मारने का खेल खेलते। नेत्रबन्ध ऐसे खेल का सूचक है, जिसमें एक लडक़ा आँख मूँदे हुए बालक के पीछे से आकर उसकी आँखों पर अपनी हथेली रखता था। तब उसकी हथेली को छूकर ही आँख मूँदे लडक़े को बतलाना पड़ता कि वह कौन है। ऐसे सभी खेलों में लडक़े दाँव लगाते थे जिससे जीतने वाले को इनाम में वंशी या छड़ी देनी पड़ती। कभी कभी लडक़े जंगली जानवरों के लडऩे की विधियों की नकल उतारते और कभी पक्षियों की तरह चीं चीं करते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥