श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 18: भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तं विद्वानपि दाशार्हो भगवान् सर्वदर्शन: ।
अन्वमोदत तत्सख्यं वधं तस्य विचिन्तयन् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस प्रलम्बासुर को; विद्वान्—भलीभाँति जानते हुए; अपि—यद्यपि; दाशार्ह:—दशार्ह के वंशज; भगवान्—भगवान् ने; सर्व-दर्शन:—सर्वज्ञ; अन्वमोदत—स्वीकार कर ली; तत्—उसके साथ; सख्यम्—मित्रता; वधम्—वध; तस्य—उसका; विचिन्तयन्—सोचते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि दशार्ह वंश में उत्पन्न भगवान् श्रीकृष्ण सब कुछ देखते हैं अतएव वे जान गये कि वह असुर कौन है। फिर भी भगवान् ने ऐसा दिखावा किया जैसे कि वे उसे अपना मित्र मान चुके हों जबकि वे गम्भीरतापूर्वक यह विचार कर रहे थे कि उसको कैसे मारा जाय।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥