श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 18: भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध  »  श्लोक 26

 
श्लोक
तमुद्वहन् धरणिधरेन्द्रगौरवं
महासुरो विगतरयो निजं वपु: ।
स आस्थित: पुरटपरिच्छदो बभौ
तडिद्‌‌द्युमानुडुपतिवाडिवाम्बुद: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उन्हें, बलदेव को; उद्वहन्—ऊँचे ले जाकर; धरणि-धर-इन्द्र—पर्वतों के राजा सुमेरु की तरह; गौरवम्—भार; महा- असुर:—महान् असुर; विगत-रय:—अपना वेग खो कर; निजम्—अपने असली; वपु:—शरीर को; स:—वह ना; आस्थित:— स्थित होकर; पुरट—सुनहरे; परिच्छद:—आभूषणों से युक्त; बभौ—चमक रहा था; तडित्—बिजली की तरह; द्यु-मान्— चमकीला; उडु-पति—चन्द्रमा; वाट्—वहन करते हुए; इव—सदृश; अम्बु-द:—बादल ।.
 
अनुवाद
 
 जब वह महान् असुर बलराम को लिये जा रहा था, तो वे विशाल सुमेरु पर्वत की तरह भारी हो गये जिससे प्रलम्ब को अपना गति धीमी करनी पड़ी। इसके बाद उसने अपना असली रूप धारण किया—तेजमय शरीर जो सुनहरे आभूषणों से ढका था और उस बादल के समान लग रहा था जिसमें बिजली चमक रही हो और जो अपने साथ चन्द्रमा लिये जा रहा हो।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर प्रलम्बासुर की उपमा बादल से, उसके सुनहरे आभूषणों की उपमा बादल के भीतर चमकने वाली बिजली से तथा बलराम की उपमा बादल के भीतर चमक रहे चन्द्रमा से दी गई है। महान् असुर अपनी योग शक्ति से अनेक रूप धारण कर सकते हैं किन्तु जब भगवान् की
आध्यात्मिक शक्ति उनकी शक्ति को कम कर देती है, तो उन्हें अपना कृत्रिम रूप त्याग कर असली आसुरी शरीर धारण करना पड़ता है। भगवान बलराम सहसा विशाल पर्वत के समान भारी हो गये जिससे वह असुर उन्हें अपने कंधों पर ऊँचे चढ़ा कर नहीं ले जा सका।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥