श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 18: भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध  »  श्लोक 27

 
श्लोक
निरीक्ष्य तद्वपुरलमम्बरे चरत्
प्रदीप्तद‍ृग् भ्रुकुटितटोग्रदंष्ट्रकम् ।
ज्वलच्छिखं कटककिरीटकुण्डल-
त्विषाद्भ‍ुतं हलधर ईषदत्रसत् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
निरीक्ष्य—देखकर; तत्—उस प्रलम्बासुर का; वपु:—शरीर; अलम्—तेजी से; अम्बरे—आकाश में; चरत्—विचरण करते; प्रदीप्त—प्रज्ज्वलित; दृक्—आँखें; भ्रु-कुटि—अपनी भौंहों पर के गुस्से का; तट—किनारे पर; उग्र—भयानक; दंष्ट्रकम्—दाँतों को; ज्वलत्—अग्नि तुल्य; शिखम्—बाल; कटक—अपने बाजूबन्द; किरीट—मुकुट; कुण्डल—तथा कुंडलों के; त्विषा— तेज से; अद्भुतम्—आश्चर्यजनक; हल-धर:—हल धारण करने वाले, बलराम; ईषत्—टुक, थोड़ा; अत्रसत्—भयभीत हुए ।.
 
अनुवाद
 
 जब हलधर भगवान् बलराम ने आकाश में विचरण करते हुए उस असुर की जलती हुई आँखें, अग्नि सदृश बाल, भौंहों तक उठे भयानक दाँत तथा उसके बाजूबन्दों, मुकुट तथा कुंडलों से उत्पन्न आश्चर्यजनक तेज युक्त विराट शरीर को देखा तो वे कुछ कुछ भयभीत से हो गये।
 
तात्पर्य
 श्रील सनातन गोस्वामी ने भगवान् बलदेव के तथाकथित भय की व्याख्या इस प्रकार की है : बलराम एक सामान्य ग्वालबाल के रूप में क्रीड़ा कर रहे थे अतएव इस लीला-भाव को बनाये रखने के लिए वे असुर के भयानक शरीर से कुछ कुछ विचलित हो गये। दूसरे यह कि वह असुर कृष्ण के ग्वालमित्र के रूप में प्रकट हुआ था और कृष्ण ने उसे मित्र मान लिया था अतएव बलदेव
उसको जान से मारने में हिचकिचा रहे थे। बलराम की चिन्ता का एक कारण यह भी हो सकता था कि यह वास्तव में ग्वालबाल के वेश में असुर था, तो हो सकता है कि उसी क्षण ऐसा ही कोई दूसरा असुर कृष्ण पर भी आक्रमण कर रहा हो। इस तरह सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान भगवान् बलदेव ने भयावने प्रलम्बासुर के समक्ष कुछ कुछ शिथिल होने की लीला प्रकट की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥