श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 18: भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध  »  श्लोक 28

 
श्लोक
अथागतस्मृतिरभयो रिपुं बलो
विहायसार्थमिव हरन्तमात्मन: ।
रुषाहनच्छिरसि द‍ृढेन मुष्टिना
सुराधिपो गिरिमिव वज्ररंहसा ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तब; आगत-स्मृति:—अपना स्मरण करते हुए; अभय:—निर्भय; रिपुम्—शत्रु को; बल:—बलराम ने; विहाय— छोडक़र; सार्थम्—साथ; इव—निस्सन्देह; हरन्तम्—हरण करते हुए; आत्मन:—अपने आप; रुषा—क्रोध के साथ; अहनत्— प्रहार किया; शिरसि—सिर के ऊपर; दृढेन—कठोर; मुष्टिना—अपनी मुट्ठी से; सुर-अधिप:—देवताओं के राजा, इन्द्र; गिरिम्— पर्वत पर; इव—सदृश; वज्र—वज्र का; रंहसा—फुर्ती से ।.
 
अनुवाद
 
 वास्तविक स्थिति का स्मरण करते हुए निर्भीक बलराम की समझ में आ गया कि यह असुर मेरा अपहरण करके मुझे मेरे साथियों से दूर ले जाने का प्रयास कर रहा है। तब वे क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने असुर के सिर पर अपनी कठोर मुट्ठी से उसी तरह प्रहार किया जिस प्रकार देवताओं के राजा इन्द्र अपने वज्र से पर्वत पर प्रहार करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् बलराम की बलिष्ठ मुट्ठी असुर के सिर पर ऐसे पड़ी कि उस के टुकड़े टुकड़े हो गये जिस तरह विशाल वज्रपात से पर्वत चूर चूर हो जाता है। विहाय सार्थम् इव पद का सन्धि-विच्छेद विहायसा अर्थम्
इव के रूप में भी किया जा सकता है, जिसका अर्थ होगा कि वह असुर विहायस अर्थात् आकाश के विराट पथ पर बलराम को ले जाने के उद्देश्य से उड़ रहा था क्योंकि वे ही उसके अर्थम् अर्थात् खोज की वस्तु थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥