श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 18: भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध  »  श्लोक 7

 
श्लोक
वनं कुसुमितं श्रीमन्नदच्चित्रमृगद्विजम् ।
गायन्मयूरभ्रमरं कूजत्कोकिलसारसम् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
वनम्—जंगल; कुसुमितम्—फूलों से पूर्ण; श्रीमत्—अत्यन्त सुन्दर; नदत्—शोर करते; चित्र—नाना प्रकार के; मृग—पशु; द्विजम्—तथा पक्षियों को; गायन्—गाते हुए; मयूर—मोर; भ्रमरम्—तथा भौंरों को; कूजत्—कुहू कुहू करते; कोकिल— कोयलों; सारसम्—तथा सारसों को ।.
 
अनुवाद
 
 फूलों से वृन्दावन बड़े ही सुन्दर ढंग से सजा हुआ था और नाना प्रकार के पशु तथा पक्षी अपनी ध्वनि से उसे पूरित कर रहे थे। मोर तथा भौंरे गा रहे थे और कोयल तथा सारस कुहू कुहू कर रहे थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥