श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 21

 
श्लोक
किमद्य तस्मिन् करणीयमाशु मेयदर्थतन्त्रो न विहन्ति विक्रमम् ।
स्त्रिया: स्वसुर्गुरुमत्या वधोऽयंयश: श्रियं हन्त्यनुकालमायु: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
किम्—क्या; अद्य—अब तुरन्त; तस्मिन्—इस स्थिति में; करणीयम्—करने योग्य; आशु—बिना बिलम्ब किये; मे—मेरा कर्तव्य; यत्—क्योंकि; अर्थ-तन्त्र:—भगवान्, जो साधुओं की रक्षा करने तथा असाधुओं का वध करने के लिए कृतसंकल्प हैं; न—नहीं; विहन्ति—त्यागते हैं; विक्रमम्—अपने पराक्रम को; स्त्रिया:—स्त्री का; स्वसु:—बहन का; गुरु-मत्या:—विशेषरूप से जब वह गर्भवती है; वध: अयम्—वध; यश:—यश; श्रियम्—ऐश्वर्य; हन्ति—नष्ट हो जाएगा; अनुकालम्—हमेशा के लिए; आयु:—तथा उम्र ।.
 
अनुवाद
 
 कंस ने सोचा: अब मुझे क्या करना चाहिए? अपना लक्ष्य जानने वाले भगवान् (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ) अपना पराक्रम त्यागने वाले नहीं हैं। देवकी स्त्री है, वह मेरी बहन है और गर्भवती भी है। यदि मैं उसे मार डालूँ तो मेरे यश, ऐश्वर्य तथा आयु निश्चित रूप से नष्ट हो जाएँगे।
 
तात्पर्य
 वैदिक नियमों के अनुसार किसी स्त्री, ब्राह्मण, वृद्ध, शिशु तथा गाय का कभी भी वध नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि भगवान् का परम शत्रु होते हुए भी कंस वैदिक संस्कृति से अवगत था और इस तथ्य के प्रति जागरूक था कि आत्मा एक शरीर से दूसरे में देहान्तर करता है और मनुष्य इस जीवन के कर्मों के अनुसार अगले जीवन में कष्ट भोगता है। इसलिए वह देवकी का वध करने से डर रहा था क्योंकि वह स्त्री थी, फिर उसकी बहन थी और तिस पर वह गर्भवती थी। क्षत्रिय वीरतापूर्ण कार्य करके विख्यात होता है। किन्तु ऐसी स्त्री को मारने में कौन सी बहादुरी
होगी जो उसकी शरण में थी? इसलिए वह देवकी का वध करने का जघन्य कार्य नहीं करना चाहता था। कंस का शत्रु तो देवकी के गर्भ के भीतर था किन्तु शत्रु का ऐसी अज्ञान की स्थिति में वध करना बहादुरी नहीं होगी। क्षत्रिय नियमों के अनुसार शत्रु से आमने-सामने तथा उचित हथियारों के साथ युद्ध करना चाहिए। और यदि शत्रु मारा जाता है, तो जीतने वाला विख्यात बनता है। कंस ने इन बातों पर बड़े विवेक से तर्क-वितर्क किया और यह पूरी तरह जानते हुए भी कि देवकी के गर्भ में उसका शत्रु प्रकट हो चुका है, वह उसका वध करने से अपने को रोकता रहा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥