श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 6

 
श्लोक
भगवानपि विश्वात्मा विदित्वा कंसजं भयम् ।
यदूनां निजनाथानां योगमायां समादिशत् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—श्रीकृष्ण ने; अपि—भी; विश्वात्मा—हर एक का परमात्मा; विदित्वा—यदुओं तथा उनके अन्य भक्तों की स्थिति जानकर; कंस-जम्—कंस के कारण; भयम्—डर; यदूनाम्—यदुओं के; निज-नाथानाम्—अपने परम आश्रय स्वरूप; योगमायाम्—कृष्ण की आध्यात्मिक शक्ति योगमाया को; समादिशत्—आदेश दिया ।.
 
अनुवाद
 
 कंस के आक्रमण से अपने निजी भक्त, यदुओं, की रक्षा करने के लिए विश्वात्मा भगवान् ने योगमाया को इस प्रकार आदेश दिया।
 
तात्पर्य
 श्रील सनातन गोस्वामी ने भगवान् अपि विश्वात्मा विदित्वा कंसजं भयम् की टीका इस प्रकार की है। भगवान् स्वयम् श्रीकृष्ण हैं। कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। वे विश्वात्मा हैं क्योंकि उनका स्वांश परमात्मा के रूप में विस्तार करता है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१३.३) से होती है। क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। भगवान् कृष्ण सभी जीवों के क्षेत्रज्ञ अर्थात् परमात्मा हैं। वे भगवान् के समस्त अंशों के आदि उद्गम हैं। विष्णु के लाखों अंश हैं यथा संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा वासुदेव किन्तु इस भौतिक जगत में विश्वात्मा तो क्षीरोदकशायी विष्णु हैं। जैसाकि भगवद्गीता (१८.६१) में कहा गया है—ईश्वर: सर्वभूतेषु हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति—हे अर्जुन! परमेश्वर समस्त जीवों के हृदय में स्थित हैं। अपने अंश विष्णुतत्त्व के रूप में कृष्ण वस्तुत: विश्वात्मा हैं फिर भी अपने भक्तों के स्नेहवश वे उन्हें निर्देश देने के लिए परमात्मा का कार्य करते हैं (सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च )।
परमात्मा के कार्य क्षीरोदकशायी विष्णु से सम्बन्धित होते हैं किन्तु कृष्ण ने अपनी भक्त देवकी पर कृपा की क्योंकि वे जानते थे कि कंस द्वारा सतायी जाने के कारण देवकी डरी हुई है। शुद्ध भक्त भौतिक अस्तित्व से सदैव डरता रहता है। कोई यह नहीं जानता कि आगे क्या होगा क्योंकि उसे किसी भी क्षण अपना शरीर बदलना पड़ सकता है (तथा देहान्तर-प्राप्ति:)। यह जानकर शुद्ध भक्त इस तरह कार्य करता है कि कहीं उसे दूसरा शरीर धारण करके संसार के कष्ट न भोगने पड़ें जिससे उसका जीवन दूषित हो जाए। यही भयम् अर्थात् डर है। भयं द्वितीयाभिनिवेशत:स्यात् (भागवत ११.२.३७)। यह भय संसार के कारण है। ठीक ठीक कहें तो हर एक को इस संसार से सतर्क और भयभीत रहना चाहिए। इस तरह संसार को न जानने से हर व्यक्ति प्रभावित होता है किन्तु भगवान् कृष्ण अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव सतर्क रहते हैं। अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए कृष्ण अपने भक्तों के प्रति इतने दयालु तथा वत्सल हैं कि वे उन्हें बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वे उन्हें एक क्षण भी भुलाये बिना भौतिक जगत में रहते रहें। भगवान् ने भगवद्गीता (१०.११) में कहा है—

तेषां एवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

“मैं उन पर कृपा के कारण उनके हृदयों में रहकर ज्ञान रूपी दीपक से अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को दूर करता हूँ।”

योग शब्द का अर्थ है “कड़ी”। कोई भी योग पद्धति भगवान् से अपने टूटे सम्बन्ध को पुन: जोडऩे का प्रयास है। योग के अनेक भेद हैं जिनमें से भक्तियोग सर्वश्रेष्ठ है। अन्य योग पद्धतियों में सिद्धि के पूर्व विविध प्रकार की विधियाँ अपनानी पड़ती हैं किन्तु भक्तियोग तो प्रत्यक्ष होता है। भगवद्गीता (६.४७) में भगवान् कहते हैं—

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मत: ॥

“समस्त योगियों में से जो योगी श्रद्धापूर्वक मेरी पूजा करते हुए मुझमें निष्ठा रखता है, वह योग में मुझसे भलीभाँति जुड़ा रहता है और वही सर्वोच्च है।” भक्तियोगी के लिए अगले जन्म में मनुष्य-शरीर मिलना निश्चित है जैसाकि कृष्ण ने कहा है (शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते )। योगमाया भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति है। भगवान् अपने भक्तों पर स्नेह के कारण निरंन्तर उनके सम्पर्क में रहते हैं अन्यथा उनकी माया शक्ति इतनी प्रबल है कि वह ब्रह्मा जैसे बड़े बड़े देवताओं को भी मोहित कर देती है। अत: भगवान् की शक्ति योगमाया कहलाती है। चूँकि भगवान् विश्वात्मा हैं अतएव उन्होंने योगमाया को आदेश दिया कि वह देवकी की रक्षा करे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥