श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 8

 
श्लोक
देवक्या जठरे गभन शेषाख्यं धाम मामकम् ।
तत् सन्निकृष्य रोहिण्या उदरे सन्निवेशय ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
देवक्या:—देवकी के; जठरे—गर्भ में; गर्भम्—भ्रूण; शेष-आख्यम्—कृष्ण के अंश, शेष नाम से विख्यात; धाम—अंश; मामकम्—मेरा; तत्—उसको; सन्निकृष्य—निकाल करके; रोहिण्या:—रोहिणी के; उदरे—गर्भ के भीतर; सन्निवेशय—बिना कठिनाई के स्थानान्तरित करो ।.
 
अनुवाद
 
 देवकी के गर्भ में संकर्षण या शेष नाम का मेरा अंश है। तुम उसे बिना किसी कठिनाई के रोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरित कर दो।
 
तात्पर्य
 कृष्ण के प्रथम अंश बलदेव हैं, जो शेष भी कहलाते हैं। भगवान् का शेष अवतार सारे ब्रह्मांड को धारण करता है और इस अवतार की शाश्वत माता हैं माता रोहिणी। भगवान् ने योगमाया से कहा, “चूँकि मैं देवकी के गर्भ में जा रहा हूँ अत: शेष अवतार पहले ही वहाँ पहुँच चुके हैं और उन्होंने वहाँ मेरे रहने की पूरी व्यवस्था कर दी है। अब उन्हें अपनी माता रोहिणी के गर्भ में प्रवेश करना चाहिए।”
इस सम्बन्ध में कोई पूछ सकता है कि भगवान् जो सदैव दिव्य रूप में स्थित हैं, किस तरह देवकी के उस गर्भ में प्रवेश पा सके जिसमें पहले ही छह असुर (षड्गर्भ ) वास कर चुके थे। तो क्या इसका यह अर्थ हुआ कि ये षड्गर्भासुर भगवान् के दिव्य शरीर के तुल्य थे? इसका उत्तर श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने दिया है, जो इस प्रकार है—

समग्र सृष्टि तथा इसके व्यष्टि अंश भी भगवान् की शक्ति के विस्तार हैं। इसलिए भौतिक जगत में भगवान् प्रवेश करके भी ऐसा नहीं करते। इसकी व्याख्या भगवान् ने स्वयं भगवद्गीता (९.४-५) में की है—

माया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।

भूत-भृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन: ॥

“यह समग्र ब्रह्माण्ड मेरे अप्रकट रूप में मुझसे व्याप्त है। सारे जीव मुझमें हैं किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ। फिर भी हर सृजित वस्तु मुझमें टिकी नहीं है। मेरे योग-ऐश्वर्य को तो देखो! यद्यपि मैं सारे जीवों का पालक हूँ और सर्वत्र रहता हूँ किन्तु मेरी आत्मा सृष्टि का उद्गम है।” सर्वं खल्विदं ब्रह्म। हर वस्तु ब्रह्म अर्थात् भगवान् का अंश है फिर भी हर वस्तु ईश्वर नहीं है और ईश्वर सर्वत्र हैं भी नहीं। हर वस्तु उन पर टिकी है और नहीं भी टिकी है। इसे केवल अचिन्त्य भेदाभेद दर्शन द्वारा समझाया जा सकता है। फिर भी ऐसे सत्य को शुद्ध भक्त के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं समझ सकता क्योंकि भगवद्गीता (१८.५५) में भगवान् कहते हैं—भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वत:—भगवान् को उनके असली रूप में केवल भक्ति द्वारा समझा जा सकता है। यद्यपि सामान्य व्यक्ति भगवान् को नहीं समझ सकते किन्तु इस सिद्धान्त को शास्त्रों के कथन से समझा जा सकता है।

शुद्ध भक्त भक्तियोग की नौ विभिन्न विधियाँ सम्पन्न करके (श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पाद सेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ) दिव्य पद पर आसीन रहता है। इस तरह भक्ति को प्राप्त भक्त इस भौतिक जगत में रहते हुए भी उसमें नहीं रहता। इतने पर भी भक्त सदा डरता रहता है कि भौतिक जगत से सान्निध्य होने से उसे अनेक कल्मष प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए वह सदैव भय के कारण चौकन्ना रहता है, जिससे उसका भौतिक सान्निध्य क्रमश: घटता जाता है।

प्रतीक रूप में माता देवकी का कंस से निरन्तर डरना उन्हें शुद्ध बना रहा था। शुद्ध भक्त को सदैव भौतिक सान्निध्य से डरते रहना चाहिए। इससे भौतिक सान्निध्य में रहनेवाले सारे असुरों का वध हो जाएगा जिस तरह कंस के द्वारा षड्गर्भासुरों का वध हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि मरीचि मन से प्रकट होता है। दूसरे शब्दों में, मरीचि मन का अवतार है। मरीचि के छह पुत्र हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य। भगवान् शुद्ध भक्ति से प्रकट होते हैं। इसकी पुष्टि वेदों द्वारा हुई है—भक्तिरेवैनं दर्शयति। केवल भक्ति से ही मनुष्य को भगवान् का सान्निध्य प्राप्त हो सकता है। भगवान् देवकी के गर्भ से प्रकट हुए इसलिए देवकी भक्ति की प्रतीक हैं और कंस भौतिक भय का प्रतीक है। जब भक्त भौतिक सान्निध्य से डरता रहता है, तो उसका असली पद—भक्ति—प्रकट होता है, जिससे उसमें भौतिक भोग के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। जब मरीचि के छहों पुत्रों का ऐसे भय द्वारा वध हो जाता है और मनुष्य भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है, तो भक्ति के गर्भ से भगवान् उत्पन्न होते हैं। इस तरह देवकी का सातवाँ गर्भ भगवान् के प्राकटय को सूचित करता है। जब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य—ये छह पुत्र मार डाले जाते हैं, तो भगवान् के प्राकट्य हेतु शेष अवतार उपयुक्त परिस्थिति उत्पन्न करता है। दूसरे शब्दों में, जब मनुष्य में उसकी सहज कृष्णचेतना जागृत होती है, तो भगवान् कृष्ण प्रकट होते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने यही व्याख्या की है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥