श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिका: ।
चेरुर्हविष्यं भुञ्जाना: कात्यायन्यर्चनव्रतम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; हेमन्ते—हेमन्त (जाड़े की) ऋतु में; प्रथमे—प्रथम; मासि—महीने में; नन्द व्रज—नन्द महाराज के ग्वालों का गाँव; कुमारिका:—अविवाहित लड़कियों ने; चेरु:—सम्पन्न किया; हविष्यम्—बिना मसाले की खिचड़ी; भुञ्जाना:—खाकर; कात्यायनी—देवी कात्यायनी का; अर्चन-व्रतम्—पूजा का व्रत ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हेमन्त ऋतु के पहले मास में गोकुल की अविवाहिता लड़कियों ने कात्यायनी देवी का पूजा-व्रत रखा। पूरे मास उन्होंने बिना मसाले की खिचड़ी खाई।
 
तात्पर्य
 हेमन्ते शब्द मार्गशीर्ष मास का सूचक है, जो पाश्चात्य कैलेंडर के अनुसार लगभग मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर तक का समय है। श्रील प्रभुपाद ने भगवान् श्रीकृष्ण (भाग १, अध्याय २२) में टीका की है कि सर्वप्रथम गोपियों ने हविष्यान्न खाया। यह
हविष्यान्न एक प्रकार का भोजन है, जो मूँग की दाल तथा चावल को एक साथ पकाकर तैयार किया जाता है, जिसमें हल्दी या कोई मसाला नहीं डाला जाता। वैदिक आदेशानुसार इस तरह का भोजन किसी अनुष्ठान को करने के पूर्व शरीर शुद्धि हेतु किया जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥