श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 18

 
श्लोक
भगवानाहता वीक्ष्य शुद्धभावप्रसादित: ।
स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीत: प्रोवाच सस्मितम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान् द्वारा; आहता:—विह्वल; वीक्ष्य—देखकर; शुद्ध—शुद्ध; भाव—स्नेह से; प्रसादित:—संतुष्ट; स्कन्धे— अपने कंधे पर; निधाय—रखकर; वासांसि—उनके वस्त्र; प्रीत:—प्यार से; प्रोवाच—बोले; स-स्मितम्—हँसते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् ने देखा कि गोपियाँ किस तरह विह्वल हैं, तो वे उनके शुद्ध प्रेम-भाव से संतुष्ट हो गये। उन्होंने अपने कन्धे पर उनके वस्त्र उठा लिए और हँसते हुए उनसे बड़े ही स्नेहपूर्वक बोले।
 
तात्पर्य
 श्रील प्रभुपाद की टीका है, “गोपियों का सहज सर्मपण इतना शुद्ध था कि कृष्ण तुरन्त ही उनसे प्रसन्न हो उठे। जिन कुमारी गोपियों ने कात्यायनी से कृष्ण को पति रूप में पाने की प्रार्थना की थी इस प्रकार से वे प्रसन्न हो गईं। कोई स्त्री अपने पति के अतिरिक्त अन्य किसी के समक्ष नंगी नहीं हो सकती। कुमारी गोपियों ने कृष्ण को पति रूप में चाहा था और उन्होंने इस प्रकार उनकी इच्छा पूरी कर दी।”
गोपियों जैसी राजसी युवतियों के लिए किसी युवक के समक्ष नग्न खड़ी होना मृत्यु से भी बढक़र था फिर भी उन्होंने कृष्ण के आनन्द के लिए सब कुछ त्यागने का निश्चय किया। कृष्ण अपने प्रति उनकी प्रेम-शक्ति को देखना चाहते थे और वे उनकी अनन्य भक्ति से पूरी तरह संतुष्ट हो गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥