श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 25

 
श्लोक
सङ्कल्पो विदित: साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम् ।
मयानुमोदित: सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्कल्प:—संकल्प; विदित:—समझ गया; साध्व्य:—हे सती साध्वी लड़कियो; भवतीनाम्—तुम्हारे; मत्-अर्चनम्—मेरी पूजा; मया—मेरे द्वारा; अनुमोदित:—समर्थित; स: असौ—वह; सत्य:—सच; भवितुम्—होए; अर्हति—अवश्य ।.
 
अनुवाद
 
 “हे साध्वी लड़कियो, मैं समझ गया कि इस तपस्या के पीछे तुम्हारा असली संकल्प मेरी पूजा करना था। तुम्हारी इस अभिलाषा का मैं अनुमोदन करता हूँ और यह अवश्य ही खरा उतरेगा।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार कृष्ण समस्त अशुद्ध इच्छाओं से मुक्त हैं उसी तरह गोपियाँ भी हैं। अतएव पति रूप में कृष्ण को प्राप्त करने का उनका प्रयास निजी इन्द्रियतृप्ति की कामना से प्रेरित न होकर कृष्ण की सेवा करने और उन्हें प्रसन्न रखने की अपार इच्छा से प्रेरित था। अपने प्रगाढ़ प्रेम के कारण गोपियाँ कृष्ण को ईश्वर के रूप में नहीं अपितु
समस्त सृष्टि के सबसे निराले बालक के रूप में देखती थीं। वे सुन्दर युवतियाँ होने के कारण अपने प्रेमभाव से ही उन्हें प्रसन्न करना चाहती थीं। कृष्ण उनकी शुद्ध इच्छा को जान गये थे अत: वे परम तुष्ट थे। भगवान् सामान्य कामवासना से ही तुष्ट होने वाले नहीं हैं किन्तु वृन्दावन की गोपियों की गहन प्रेमाभक्ति से वे अभिभूत हो गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥