श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 26

 
श्लोक
न मय्यावेशितधियां काम: कामाय कल्पते ।
भर्जिता क्‍वथिता धाना: प्रायो बीजाय नेशते ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; मयि—मुझमें; आवेशित—लीन; धियाम्—चेतना वाली; काम:—इच्छा; कामाय—भौतिक विषय वासना की ओर; कल्पते—ले जाती है; भर्जिता:—जलाया गया; क्वथिता:—पकाया गया; धाना:—अन्न; प्राय:—अधिकांशत:; बीजाय— नवीन वृद्धि; न इष्यते—उत्पन्न नहीं कर सकते ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग अपना मन मुझ पर टिका देते हैं उनकी इच्छा उन्हें इन्द्रियतृप्ति की ओर नहीं ले जाती जिस तरह कि धूप से झुलसे और फिर अग्नि में पकाये गये जौ के बीज नये अंकुर बन कर नहीं उग सकते।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर मय्यावेशितधियाम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कोई भी व्यक्ति भक्ति में उच्च स्थान प्राप्त किये बिना अपना मन तथा बुद्धि कृष्ण पर स्थिर नहीं कर सकता क्योंकि कृष्ण शुद्ध आध्यात्मिक हैं। आत्म-साक्षात्कार निष्काम भाव की स्थिति नहीं है अपितु शुद्ध की गई इच्छा है, जिसमें मनुष्य को एकमात्र
कृष्ण के आनन्द की कामना होती है। गोपियाँ कृष्ण के प्रति निश्चित रूप से माधुर्य रस से आकृष्ट थीं फिर भी अपने मन तथा अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को कृष्ण पर स्थिर करने के बावजूद उनके माधुर्य भाव में कभी कोई भौतिक वासना प्रकट नहीं हुई, प्रत्युत वह ब्रह्माण्ड में न दिखने वाला सर्वोच्च भगवत्प्रेम बन गया।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥