श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 27

 
श्लोक
याताबला व्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथा क्षपा: ।
यदुद्दिश्य व्रतमिदं चेरुरार्यार्चनं सती: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
यात—अब जाओ; अबला:—हे बालिकाओ; व्रजम्—व्रज; सिद्धा:—इच्छा पूर्ति करके; मया—मेरे साथ; इमा:—ये; रंस्यथ—तुम बिता सकोगी; क्षपा:—रातें; यत्—जो; उद्दिश्य—मन में रखकर; व्रतम्—व्रत; इदम्—यह; चेरु:—तुमने किया है; आर्या—कात्यायनी देवी की; अर्चनम्—पूजा; सती:—शुद्ध होने से ।.
 
अनुवाद
 
 हे बालाओ, जाओ, अब व्रज लौट जाओ। तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई है क्योंकि तुम आने वाली रातें मेरे साथ बिता सकोगी। हे शुद्ध हृदय वाली गोपियो, देवी कात्यायनी की पूजा करने के पीछे तुम्हारे व्रत का यही तो उद्देश्य था!
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥