श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 29

 
श्लोक
अथ गोपै: परिवृतो भगवान् देवकीसुत: ।
वृन्दावनाद्गतो दूरं चारयन् गा: सहाग्रज: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—कुछ समय बाद; गोपै:—ग्वालबालों से; परिवृत:—घिरे हुए; भगवान्—भगवान्; देवकी-सुत:—देवकीपुत्र; वृन्दावनात्—वृन्दावन से; गत:—गये; दूरम्—दूर; चारयन्—चराते हुए; गा:—गौवें; सह-अग्रज:—अपने भाई बलराम के साथ ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ काल बाद देवकीपुत्र कृष्ण अपने ग्वालबाल मित्रों से घिरकर तथा अपने बड़े भाई बलराम के संग गौवें चराते हुए वृन्दावन से काफी दूर निकल गये।
 
तात्पर्य
 गोपियों के वस्त्रहरण का वर्णन कर चुकने के बाद शुकदेव गोस्वामी कुछ कर्मकाण्डी ब्राह्मणों
की पत्नियों को भगवान् कृष्ण द्वारा वर दिये जाने की भूमिका आरम्भ कर रहे हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥