श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 37

 
श्लोक
तत्र गा: पाययित्वाप: सुमृष्टा: शीतला: शिवा: ।
ततो नृप स्वयं गोपा: कामं स्वादु पपुर्जलम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; गा:—गौवों को; पाययित्वा—पानी पिलाकर; अप:—जल; सु-मृष्टा:—अत्यन्त स्वच्छ; शीतला:—शीतल; शिवा:—स्वास्थ्यप्रद; तत:—तत्पश्चात्; नृप—हे राजा परीक्षित; स्वयम्—अपने से; गोपा:—ग्वालबाल; कामम्— स्वच्छन्दतापूर्वक; स्वादु—स्वादिष्ट; पपु:—पिया; जलम्—जल ।.
 
अनुवाद
 
 ग्वालों ने गौवों को यमुना नदी का स्वच्छ, शीतल तथा स्वास्थ्यप्रद जल पीने दिया। हे राजा परीक्षित, ग्वालों ने भी जी भरकर उस मधुर जल का पान किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥