श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 4

 
श्लोक
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम: ।
इति मन्त्रं जपन्त्यस्ता: पूजां चक्रु: कुमारिका: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
कात्यायनी—हे देवी कात्यायनी; महा-माये—हे महामाया; महा-योगिनि—हे महायोगिनी; अधीश्वरि—हे शक्तिमान नियंत्रक; नन्द-गोप-सुतम्—महाराज नंद के पुत्र को; देवि—हे देवी; पतिम्—पति; मे—मेरा; कुरु—बना दें; ते—आपको; नम:— नमस्कार; इति—इन शब्दों से; मन्त्रम्—मंत्र; जपन्त्य:—जपती हुई; ता:—उन; पूजाम्—पूजा; चक्रु:—सम्पन्न किया; कुमारिका:—अविवाहिता लड़कियों ने ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक अविवाहिता लडक़ी ने निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए उनकी पूजा की: “हे देवी कात्यायनी, हे महामाया, हे महायोगिनी, हे अधीश्वरी, आप महाराज नन्द के पुत्र को मेरा पति बना दें। मैं आपको नमस्कार करती हूँ।”
 
तात्पर्य
 विभिन्न आचार्यों के अनुसार इस श्लोक में उल्लिखित देवी दुर्गा मोहमाया नहीं अपितु योगमाया कहलाने वाली अंतरंगा शक्ति हैं। नारद पञ्चरात्र में श्रुति तथा विद्या के वार्तालाप में भगवान् की अन्तरंगा शक्ति और बहिरंगा शक्ति एवं मोहमाया तथा योगमाया का अन्तर बताया गया है— जानात्येकापरा कान्तं सैवा दुर्गा तदात्मिका।
या परा परमा शक्तिर्महाविष्णुस्वरूपिणी ॥

यस्या विज्ञानमात्रेण पराणां परमात्मन:।

मुहूर्ताद् देवदेवस्य प्राप्तिर्भवति नान्यथा ॥

एकेयं प्रेमसर्वस्वस्वभावा गोकुलेश्वरी।

अनया सुलभो ज्ञेय आदिदेवोऽखिलेश्वर: ॥

अस्या आवारिकशक्तिर्महामायाखिलेश्वरी।

यया मुग्धं जगत्सर्वं सर्वे देहाभिमानिन: ॥

“भगवान् की अपराशक्ति दुर्गा कहलाती है, जो भगवान् की प्रेमाभक्ति में समर्पित हैं। भगवान् की शक्ति होने के कारण यह अपराशक्ति उनसे अभिन्न है। एक अन्य पराशक्ति है, जिसका आध्यात्मिक स्वरूप साक्षात् भगवान् जैसा ही है। इस पराशक्ति को वैज्ञानिक ढंग से समझ लेने मात्र से सभी आत्माओं के परमात्मा, समस्त ईश्वरों के ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। उन्हें प्राप्त करने की कोई अन्य विधि नहीं है। यह पराशक्ति गोकुलेश्वरी अर्थात् गोकुल की देवी कहलाती है। वे स्वभाव से भगवत्प्रेम में सदैव मग्न रहती हैं और उन्हीं के माध्यम से सभी के स्वामी, आदि ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। इस अन्तरंगा शक्ति की एक आच्छादक शक्ति होती है, जो महामाया कहलाती है। और वही भौतिक जगत पर शासन चलाती है। वास्तव में वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मोहती है, जिसके कारण ब्रह्माण्ड के भीतर का हर प्राणी अपनी पहचान भौतिक शरीर के रूप में करता है।”

उपर्युक्त कथन से यह समझा जा सकता है कि भगवान् की अंतरंगा तथा बहिरंगा अर्थात् परा तथा अपरा शक्तियाँ क्रमश: योगमाया तथा महामाया के रूप में हैं। कभी कभी दुर्गा नाम अन्तरंगा पराशक्ति के द्योतन हेतु प्रयुक्त किया जाता है जैसाकि पञ्चरात्र में वर्णित है :“कृष्ण की पूजा के लिए प्रयुक्त किये जानेवाले सारे मंत्रों में अधिष्ठात्री देवी दुर्गा कहलाती है।” इस तरह परब्रह्म कृष्ण की महिमा और पूजा में प्रयुक्त दिव्य ध्वनियों में उस विशिष्ट मंत्र की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा कहलाती है। अत: दुर्गा नाम उस व्यक्तित्व का सूचक है, जो भगवान् की अन्तरंगा शक्ति के रूप में कार्य करता है और शुद्धसत्त्व के पद पर होता है। यह अन्तरंगा शक्ति कृष्ण की बहन, एकांशा या सुभद्रा मानी जाती है। वृन्दावन की गोपियाँ इसी दुर्गा की पूजा करती थीं। कई आचार्यों ने इंगित किया है कि सामान्य लोग कभी कभी मोहग्रस्त होकर सोचते हैं कि महामाया तथा दुर्गा नाम भगवान् की बहिरंगा शक्ति के लिए ही प्रयुक्त होते हैं।

यदि हम यह मान लें कि गोपियाँ बहिरंगा माया की पूजा करती थीं तो इसमें उनका कोई दोष नहीं है क्योंकि कृष्ण की लीलाओं में वे समाज के सामान्य जन की भूमिका निभा रही थीं। इस सम्बन्ध में श्रील प्रभुपाद की टीका है : “वैष्णव लोग सामान्यतया किसी देवता की पूजा नहीं करते। श्रील नरोत्तम दास ठाकुर ने शुद्ध भक्ति में अग्रसर होने के इच्छुक व्यक्ति को समस्त देवताओं की पूजा करने से कठोरता से वर्जित किया है। फिर भी गोपियाँ, जिनका कृष्ण-प्रेम अद्वितीय है, दुर्गा की पूजा करती देखी जाती हैं। देवताओं के पूजक भी कभी कभी उल्लेख करते हैं कि गोपियाँ भी देवी दुर्गा की पूजा करती थीं किन्तु हमें गोपियों के उद्देश्य को समझना चाहिए। सामान्यतया लोग किसी भौतिक वर के लिए देवी दुर्गा की पूजा करते हैं। यहाँ तो गोपियाँ कृष्ण को प्रसन्न करने या उनकी सेवा करने के लिए कोई भी साधन अपना सकती थीं। यह गोपियों की सर्वोत्कृष्ट विशिष्टता थी। उन्होंने कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए दुर्गा देवी की पूरे एक मास तक पूजा की। प्रतिदिन वे नन्द महाराज के पुत्र, कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए प्रार्थना करती थीं।”

निष्कर्ष यह निकला कि कृष्ण के निष्ठावान भक्त दिव्य गोपियों में किसी भौतिक गुण के विद्यमान होने की कभी कल्पना नहीं करेंगे क्योंकि गोपियाँ कृष्ण की सर्वोच्च भक्त हैं। उनके समस्त कार्यों का एकमात्र लक्ष्य कृष्ण से प्रेम करना और उन्हें प्रसन्न करना था और यदि हम मूर्खतावश उनके कार्यकलापों को सांसारिक मानते हैं, तो फिर हम कृष्णभावनामृत को कदापि नहीं समझ सकेंगे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥