श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 28: कृष्ण द्वारा वरुणलोक से नन्द महाराज की रक्षा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.28.14 
इति सञ्चिन्त्य भगवान् महाकारुणिको हरि: ।
दर्शयामास लोकं स्वं गोपानां तमस: परम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इन शब्दों में; सञ्चिन्त्य—अपने आप सोच कर; भगवान्—भगवान्; महा-कारुणिक:—अत्यन्त कृपालु; हरि:—भगवान् हरि ने; दर्शयाम् आस—दिखलाया; लोकम्—लोक, वैकुण्ठ; स्वम्—अपना; गोपानाम्—ग्वालों को; तमस:—भौतिक अंधकार से; परम्—परे ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार परिस्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए परम दयालु भगवान् हरि ने ग्वालों को अपना धाम दिखलाया जो भौतिक अंधकार से परे है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से स्पष्ट है कि परम सत्य अपने निजी नित्य धाम में निवास करते हैं। हम लोग शान्ति तथा सौन्दर्य से घिरकर अधिकाधिक सुखपूर्वक रहने का प्रयास करते हैं। तो भला किस तरह तर्क के नाम पर हम अपने स्रष्टा परमात्मा एवं उनके सुखद सुन्दर धाम से ईर्ष्या कर सकते हैं, जो सामान्य लोगों में भगवद्धाम के नाम से विख्यात है?
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥