श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 1-5

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
अथ सर्वगुणोपेत: काल: परमशोभन: ।
यर्ह्येवाजनजन्मक्षन शान्तर्क्षग्रहतारकम् ॥ १ ॥
दिश: प्रसेदुर्गगनं निर्मलोडुगणोदयम् ।
मही मङ्गलभूयिष्ठपुरग्रामव्रजाकरा ॥ २ ॥
नद्य: प्रसन्नसलिला ह्रदा जलरुहश्रिय: ।
द्विजालिकुलसन्नादस्तवका वनराजय: ॥ ३ ॥
ववौ वायु: सुखस्पर्श: पुण्यगन्धवह: शुचि: ।
अग्नयश्च द्विजातीनां शान्तास्तत्र समिन्धत ॥ ४ ॥
मनांस्यासन् प्रसन्नानि साधूनामसुरद्रुहाम् ।
जायमानेऽजने तस्मिन् नेदुर्दुन्दुभय: समम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ—भगवान् के आविर्भाव के समय; सर्व—चारों ओर; गुण-उपेत:— भौतिक गुणों से सम्पन्न; काल:—उपयुक्त समय; परम-शोभन:—अत्यन्त शुभ तथा सभी दृष्टियों से उपयुक्त; यर्हि—जब; एव— निश्चित रूप से; अजन जन्म-ऋक्षम्—रोहिणी नक्षत्र समूह; शान्त-ऋक्ष—सारे नक्षत्र शान्त थे; ग्रह-तारकम्—तथा ग्रह एवं तारे (यथा अश्विनी); दिश:—सारी दिशाएँ; प्रसेदु:—अत्यन्त शुभ तथा शान्त प्रतीत हुईं; गगनम्—आकाश; निर्मल-उडु-गण- उदयम्—जिसमें सारे शुभ नक्षत्र दृष्टिगोचर थे; मही—पृथ्वी; मङ्गल-भूयिष्ठ-पुर-ग्राम-व्रज-आकरा:—जिसके अनेक नगर, ग्राम, गोचर भूमि तथा खानें शुभ तथा निर्मल हो गईं; नद्य:—नदियाँ; प्रसन्न-सलिला:—जल स्वच्छ हो गया; ह्रदा:—झीलें या जलाशय; जलरुह-श्रिय:—चारों ओर कमलों के खिलने से अत्यन्त सुन्दर लगने लगा; द्विज-अलि-कुल-सन्नाद-स्तवका:— पक्षियों (विशेषतया कोयल) तथा मधुमक्खियों का समूह मधुर ध्वनि में कीर्तन करने लगा, मानो भगवान् की स्तुति कर रहे हों; वन-राजय:—हरे वृक्ष भी देखने में मनोहर लग रहे थे; ववौ—बहने लगी; वायु:—वायु, मन्द हवा; सुख-स्पर्श:—छूने में सुहावनी; पुण्य-गन्ध-वह:—सुगन्ध से पूरित; शुचि:—धूल से रहित; अग्नय: च—तथा यज्ञस्थलों की अग्नियाँ; द्विजातीनाम्— ब्राह्मणों की; शान्ता:—शान्त; तत्र—वहाँ; समिन्धत—जलती हुई; मनांसि—ब्राह्मणों के मन (जो कंस से भयभीत थे); आसन्—हो गए; प्रसन्नानि—पूर्ण तुष्ट तथा उत्पात से रहित; साधूनाम्—ब्राह्मणों के, जो सबके सब वैष्णव भक्त थे; असुर- द्रुहाम्—जो धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करते समय कंस तथा अन्य असुरों द्वारा सताए गए थे; जायमाने—जन्म होने से; अजने— अजन्मे, भगवान् विष्णु के; तस्मिन्—उस स्थान में; नेदु:—बज उठीं; दुन्दुभय:—दुन्दुभियाँ; समम्—एकसाथ (ऊपरी लोकों से) ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् भगवान् के आविर्भाव की शुभ बेला में सारा ब्रह्माण्ड सतोगुण, सौन्दर्य तथा शान्ति से युक्त हो गया। रोहिणी नक्षत्र तथा अश्विनी जैसे तारे निकल आए। सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य नक्षत्र एवं ग्रह अत्यन्त शान्त थे। सारी दिशाएँ अत्यन्त सुहावनी लगने लगीं और मनभावन नक्षत्र निरभ्र आकाश में टिमटिमाने लगे। नगरों, ग्रामों, खानों तथा चरागाहों से अलंकृत पृथ्वी सर्व-मंगलमय प्रतीत होने लगी। निर्मल जल से युक्त नदियाँ प्रवाहित होने लगीं और सरोवर तथा विशाल जलाशय कमलों तथा कुमुदिनियों से पूर्ण होकर अत्यधिक सुन्दर लगने लगे। फूलों- पत्तियों से पूर्ण एवं देखने में सुहावने लगने वाले वृक्षों और हरे पौधों में कोयलों जैसे पक्षी तथा भौरों के झुण्ड देवताओं के लिए मधुर ध्वनि में गुंजार करने लगे। निर्मल मन्द वायु बहने लगी जिसका स्पर्श सुखद था और जो फूलों की गन्ध से युक्त थी। जब कर्मकाण्ड में लगे ब्राह्मणों ने वैदिक नियमानुसार अग्नि प्रज्ज्वलित की तो अग्नि इस वायु से अविचलित रहती हुई स्थिर भाव से जलने लगी। इस तरह जब अजन्मा भगवान् विष्णु प्रकट होने को हुए तो कंस जैसे असुरों तथा उसके अनुचरों द्वारा सताए गए साधुजनों तथा ब्राह्मणों को अपने हृदयों के भीतर शान्ति प्रतीत होने लगी और उसी समय स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बज उठीं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि “मेरा जन्म तथा कार्यकलाप सभी दिव्य हैं। जो मुझे यथार्थत: समझ लेता है, वह तुरन्त वैकुण्ठ जाने के योग्य बन जाता है।” भगवान् का जन्म सामान्य व्यक्ति जैसा नहीं होता, जिसे अपने पूर्वकर्म के अनुसार भौतिक शरीर धारण करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। भगवान् के प्राकटय की व्याख्या पिछले अध्याय में हो चुकी है वे स्वेच्छा से प्रकट होते हैं।
जब भगवान् के प्राकट्य का समय आ गया तो नक्षत्र शुभ हो गए। रोहिणी नक्षत्र का ज्योतिष फल भी प्रधान था क्योंकि यह नक्षत्र अत्यन्त शुभ माना जाता है। रोहिणी ब्रह्मा के अधीन है और ब्रह्मा विष्णु से उत्पन्न हैं। रोहिणी अजन्मा विष्णु के जन्म के समय विष्णु से ही जन्म लेकर प्रकट होता है। ज्योतिष के अनुसार नक्षत्रों की स्थिति के अतिरिक्त विभिन्न ग्रहों की विभिन्न स्थितियों के कारण शुभ तथा अशुभ क्षण होते हैं। कृष्ण-जन्म के समय सारे ग्रहों का अपने आप ऐसा तालमेल बैठा कि सब कुछ शुभ बन गया।

उस समय पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण सभी दिशाओं में शान्ति तथा सम्पन्नता का वातावरण था। आकाश में शुभ नक्षत्र दिख रहे थे और पृथ्वी पर सारे नगरों, सारे ग्रामों या चरागाहों में तथा हर प्राणी के मन के भीतर सौभाग्य के लक्षण प्रकट हो रहे थे। नदियाँ जल से पूर्ण थीं और सरोवर सुन्दर कमलों से सुशोभित थे। जंगल सुन्दर पक्षियों तथा मोरों से पूर्ण थे। जंगल के सारे पक्षी मधुर ध्वनि से गाने लगे और मोर मोरनियों के साथ नाचने लगे। सुखद मन्द वायु विभिन्न फूलों की गन्ध लेकर प्रवाहित होने लगी जिसका स्पर्श अत्यन्त सुखद था। अग्नि यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों को यज्ञ करने के लिए अपने घर अत्यन्त सुखद प्रतीत होने लगे। आसुरी राजाओं के उत्पातों के कारण ब्राह्मणों के घरों की यज्ञ-अग्नि प्राय: बुझ चुकी थी, किन्तु वही अब पुन: शान्तिपूर्वक जलने लगी। यज्ञों पर पाबन्दी लगाए जाने से ब्राह्मण मन, बुद्धि तथा कर्म से अत्यन्त संतप्त थे। किन्तु कृष्ण के आविर्भाव के समय उनके मन स्वत: प्रसन्नता से भर उठे क्योंकि आकाश में भगवान् के प्राकट्य को घोषित करने वाली दिव्य ध्वनि जोर से सुनाई पडऩे लगी थी।

कृष्ण-जन्म के अवसर पर समस्त ब्रह्माण्ड में ऋतु-परिवर्तन हो गया। यद्यपि कृष्ण भादों (सितम्बर) मास में उत्पन्न हुए थे, किन्तु ऐसा लग रहा था मानो वसन्त हो। वायुमण्डल शीतल था और नदियाँ तथा जलाशय ऐसे लग रहे थे मानो शरद ऋतु हो। कमल तथा कुमुदिनियाँ दिन में खिलती हैं, किन्तु जब कृष्ण प्रकट हुए तो आधी रात में भी वे खिली थीं और सुगन्धित वायु बह रही थी। कंस के उत्पातों के कारण सारे वैदिक कर्मकाण्ड बन्द हो चुके थे। ब्राह्मण तथा साधुगण शान्त चित्त होकर वैदिक अनुष्ठान नहीं कर पा रहे थे, किन्तु अब वे ही ब्राह्मण बिना उत्पात के दैनिक अनुष्ठान करके अत्यन्त प्रसन्न थे। असुरों का कार्य है सुरों, भक्तों तथा ब्राह्मणों को सताना, किन्तु कृष्ण के आविर्भाव के समय ये भक्त तथा ब्राह्मण व्यवधानरहित थे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥