श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 18

 
श्लोक
य आत्मनो द‍ृश्यगुणेषु सन्निति
व्यवस्यते स्वव्यतिरेकतोऽबुध: ।
विनानुवादं न च तन्मनीषितं
सम्यग् यतस्त्यक्तमुपाददत् पुमान् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो भी; आत्मन:—आत्मा का; दृश्य-गुणेषु—शरीर इत्यादि दृश्य पदार्थों में से; सन्—उस अवस्था को प्राप्त; इति—इस प्रकार; व्यवस्यते—कर्म करता रहता है; स्व-व्यतिरेकत:—मानो शरीर आत्मा से स्वतंत्र है; अबुध:—धूर्त, मूढ़; विना अनुवादम्—समुचित अध्ययन के बिना; न—नहीं; च—भी; तत्—शरीर तथा अन्य दृश्य वस्तुएँ; मनीषितम्—विवेचना किया हुआ; सम्यक्—पूरी तरह; यत:—मूर्ख होने के कारण; त्यक्तम्—तिरस्कृत कर दिए जाते हैं; उपाददत्—इस शरीर को वास्तविकता मान बैठता है; पुमान्—मनुष्य ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति प्रकृति के तीन गुणों से बने अपने दृश्य शरीर को आत्मा से स्वतंत्र मानता है, वह अस्तित्व के आधार से ही अनजान होता है और इसलिए वह मूढ़ है। जो विद्वान हैं, वे इस निर्णय को नहीं मानते क्योंकि विवेचना द्वारा यह समझा जा सकता है कि आत्मा से निराश्रित दृश्य शरीर तथा इन्द्रियाँ सारहीन हैं। यद्यपि इस निर्णय को अस्वीकार कर दिया गया है, किन्तु मूर्ख व्यक्ति इसे सत्य मानता है।
 
तात्पर्य
 आत्मा के मूलाधार के बिना शरीर उत्पन्न नहीं हो सकता। यद्यपि तथाकथित विज्ञानियों ने अपनी-अपनी रासायनिक प्रयोगशालाओं में सजीव प्राणी को उत्पन्न करने के नानाविध प्रयास किए हैं, किन्तु वे ऐसा कर नहीं पाए क्योंकि जब तक आत्मा विद्यमान नहीं होता तब तक भौतिक तत्त्वों से शरीर निर्मित नहीं किया जा सकता। चूँकि विज्ञानी शरीर की रासायनिक रचना के विषय में जो सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं उनके प्रति अब मुग्ध हैं, अत: हमने अनेक विज्ञानियों को ललकारा है कि वे एक छोटा सा अंडा तो बनाकर दिखला दें। अंडे के रासायनिक पदार्थ सरलता से उपलब्ध किए जा सकते हैं। उसमें एक सफेद अंश होता है और एक पीला अंश। ये एक आवरण से ढके रहते हैं और आधुनिक विज्ञानी सरलता से इसकी नकल कर सकते हैं। माना कि वे ऐसा अंडा बना भी लें, किन्तु जब उसे वे इनकुबेटर के भीतर रखते हैं, तो इस मनुष्यनिर्मित रासायनिक अंडे से मुर्गी के चूजे नहीं निकलते। इसमें आत्मा का योग होना ही चाहिए क्योंकि जीव केवल रासायनिक संयोग नहीं है। अत: जो लोग सोचते हैं कि आत्मा के बिना जीवन का अस्तित्व हो सकता है उन्हें अबुध: या मूर्ख कहा गया है।
पुन: कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो शरीर को अपर्याप्त समझकर शरीर का तिरस्कार करते हैं। वे भी मूर्खों की ही श्रेणी में आते हैं। इस शरीर का न तो तिरस्कार किया जा सकता है न ही इसे पर्याप्त कहकर स्वीकार किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान् तथा शरीर एवं आत्मा, भगवान् की ही शक्तियाँ हैं जिनका वर्णन स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (७.४-५) में किया है—

भूमिरापोऽनलोवायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥

“पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार ये मेरी आठ विभिन्न भौतिक शक्तियाँ हैं। किन्तु हे महाबाहु अर्जुन! इस अपरा शक्ति के अतिरिक्त भी मेरी एक पराशक्ति है, जो उन समस्त जीवों से युक्त है, जो भौतिक प्रकृति से संघर्ष कर रहे हैं और ब्रह्माण्ड को बनाये रखे हुए हैं।” अतएव शरीर का भगवान् से वैसा ही सम्बन्ध होता है जैसा आत्मा का होता है। चूँकि दोनों ही भगवान् की शक्तियाँ हैं अतएव इनमें से कोई भी मिथ्या नहीं है क्योंकि उनका आगम वास्तव में हुआ होता है। जो जीवन के इस रहस्य को नहीं जानता वह अबुध: कहा जाता है। वैदिक आदेशों के अनुसार—ऐतदात्म्यम् इदं सर्वम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म—सारी वस्तुएँ परब्रह्म हैं। अतएव शरीर तथा आत्मा दोनों ही ब्रह्म हैं क्योंकि पदार्थ तथा आत्मा ब्रह्म से उद्भूत हैं।

वेदों के निर्णयों से ज्ञात न होने के कारण कुछ लोग भौतिक प्रकृति को पदार्थ के रूप में स्वीकार करते हैं और कुछ लोग आत्मा को पदार्थ मानते हैं, किन्तु वास्तव में ब्रह्म ही पदार्थ है। ब्रह्म समस्त कारणों का कारण है। इस जगत के अवयव तथा कारण ब्रह्म है और इस जगत के अवयवों को हम ब्रह्म से स्वतंत्र नहीं रख सकते। साथ ही, चूँकि इस भौतिक जगत के अवयव तथा इसका कारण ब्रह्म ही है अतएव ये दोनों ही सत्य हैं अत: ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या वक्तव्य की कोई वैधता नहीं है। यह जगत मिथ्या नहीं है।

ज्ञानी लोग इस जगत का निषेध करते हैं और मूर्ख लोग इसे ही सत्य मानते हैं। इस तरह दोनों ही दिग्भ्रमित रहते हैं। यद्यपि आत्मा की तुलना में शरीर महत्त्वपूर्ण नहीं है, किन्तु हम यह तो नहीं कह सकते कि वह मिथ्या है। फिर भी शरीर नश्वर है और जो मूर्ख भौतिकतावादी व्यक्ति हैं, जिन्हें आत्मा का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं है, नश्वर शरीर को सत्य मानकर उसको सजाने-सँवारने में लगे रहते हैं। शरीर को मिथ्या मानकर उसका निषेध तथा शरीर को सर्वस्व मानना इन दोनों दोषों से—बचा जा सकता है यदि कृष्णभावनामृत पद को प्राप्त कर लिया जाए। यदि हम इस जगत को मिथ्या मानते हैं, तो असुरों की कोटि में आ जाते हैं, जो यह कहते हैं कि यह जगत मिथ्या है, इसका कोई आधार नहीं है और ईश्वर इसका नियंत्रक नहीं है (असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् )। भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में इसे असुरों का निर्णय कहा गया है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥