श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 32

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
त्वमेव पूर्वसर्गेऽभू: पृश्न‍ि: स्वायम्भुवे सति ।
तदायं सुतपा नाम प्रजापतिरकल्मष: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने देवकी से कहा; त्वम्—तुम; एव—निस्सन्देह; पूर्व-सर्गे—पूर्व युग में; अभू:—थीं; पृश्नि:— पृश्नि नामक; स्वायम्भुवे—स्वायम्भुव मनु के युग में; सति—हे सती; तदा—उस समय; अयम्—यह वसुदेव; सुतपा—सुतपा; नाम—नामक; प्रजापति:—प्रजापति; अकल्मष:—निर्मल व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीभगवान् ने उत्तर दिया: हे सती माता, आप अपने पूर्व जन्म में स्वायंभुव मनु कल्प में पृश्नि नाम से विख्यात थीं और वसुदेव सुतपा नामक अत्यन्त पवित्र प्रजापति थे।
 
तात्पर्य
 भगवान् ने यह स्पष्ट कर दिया कि देवकी पहली बार ही उन की माता नहीं बनीं प्रत्युत वे इसके पूर्व भी उनकी माता थीं। कृष्ण शाश्वत हैं और वे अपने भक्तों में से ही शाश्वत रूप से अपने माता-पिता का चुनाव करते रहते हैं। इसके पूर्व भी देवकी भगवान् की माता और वसुदेव उनके पिता थे। तब उनके नाम क्रमश: पृश्नि तथा सुतपा थे। जब भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण प्रकट होते हैं, तो वे माता-पिता का चुनाव करते हैं और वे भी कृष्ण को पुत्र रूप में स्वीकार करते हैं। यह लीला निरन्तर चलती रहती है इसलिए नित्यलीला कहलाती है। इस तरह यह आश्चर्य या उपहास की बात न थी। भगवान् ने स्वयं भगवद्गीता (४.९) में स्पष्ट किया है—
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“हे अर्जुन! जो मेरे प्राकट्य तथा कार्यों की दिव्य प्रकृति को जान लेता है, वह इस शरीर को त्यागने के बाद इस भौतिक जगत में फिर से जन्म नहीं लेता अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है।” मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के प्राकट्य तथा तिरोधान को वैदिक महाजनों से समझे, कल्पना से नहीं। जो भगवान् के विषय में कल्पना का अनुसरण करता है, वह निन्दनीय है।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावम् अजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥

(भगवद्गीता ९.११) भगवान् अपने परं भावम् के द्वारा अपने भक्त के पुत्र रूप में प्रकट होते हैं। भाव शब्द शुद्ध प्रेम अवस्था का द्योतक है, जिसका भौतिक व्यापारों से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥