श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 37-38

 
श्लोक
तदा वां परितुष्टोऽहममुना वपुषानघे ।
तपसा श्रद्धया नित्यं भक्त्या च हृदि भावित: ॥ ३७ ॥
प्रादुरासं वरदराड् युवयो: कामदित्सया ।
व्रियतां वर इत्युक्ते माद‍ृशो वां वृत: सुत: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
तदा—तब (बारह हजार दिव्य वर्ष बीत जाने पर); वाम्—तुम दोनों के साथ; परितुष्ट: अहम्—मैं संतुष्ट हुआ; अमुना—इससे; वपुषा—कृष्ण के रूप में; अनघे—हे निष्पाप माता; तपसा—तपस्या के द्वारा; श्रद्धया—श्रद्धापूर्वक; नित्यम्—निरन्तर (लगे रहकर); भक्त्या—भक्ति के द्वारा; च—भी; हृदि—हृदय के भीतर; भावित:—स्थिर (संकल्प); प्रादुरासम्—तुम्हारे समक्ष (उसी तरह) प्रकट हुआ; वर-द-राट्—श्रेष्ठ वरदायक; युवयो:—तुम दोनों का; काम-दित्सया—इच्छा पूरी करने के लिए; व्रियताम्—तुमसे मन की बात कहने के लिए पूछा; वर:—वरदान के लिए; इति उक्ते—इस तरह अनुरोध किए जाने वाले; मादृश:—मेरी ही तरह; वाम्—तुम दोनों का; वृत:—पूछा गया था; सुत:—तुम्हारे पुत्र रूप में (तुमने मेरे जैसा पुत्र चाहा था) ।.
 
अनुवाद
 
 हे निष्पाप माता देवकी, उन बारह हजार दिव्य वर्षों के बीत जाने पर, जिनमें तुम अपने हृदय में परम श्रद्धा, भक्ति तथा तपस्यापूर्वक निरन्तर मेरा ध्यान करती रही, मैं तुम से अत्यन्त प्रसन्न हुआ था। चूँकि मैं वर देने वालों में सर्वश्रेष्ठ हूँ, अत: मैं इसी कृष्ण रूप में प्रकट हुआ कि तुम मनवाञ्छित वर माँगो। तब तुमने मेरे सदृश पुत्र-प्राप्ति की इच्छा प्रकट की थी।
 
तात्पर्य
 जो लोग स्वर्गलोक में रहते हैं उनके लिए बारह हजार दिव्य वर्ष दीर्घ काल नहीं है भले ही इस लोक के रहने वालों के लिए यह सुदीर्घ अन्तराल लगे। सुतपा ब्रह्मा का पुत्र था। भगवद्गीता से (८.१७) ज्ञात है कि ब्रह्मा का एक दिन हमारी गणना के लाखों वर्षों के तुल्य होता है (सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदु:)। हमें ध्यान रखना होगा कि कृष्ण जैसा पुत्र पाने के लिए कितनी महान् तपस्या करनी होती है। यदि हम चाहते हैं कि भगवान् हमारे बीच इस भौतिक जगत में प्रकट हों तो इसके लिए कठिन तपस्या की आवश्यकता होगी, किन्तु यदि हम कृष्ण के पास वापस जाना चाहें (त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेतिऽर्जुन ) तो हमें केवल कृष्ण को समझना तथा उनसे प्रेम करना होगा। प्रेम के द्वारा ही हम भगवद्धाम वापस जा सकते हैं। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने घोषित किया—प्रेमा पुमर्थो महान्—भगवत्प्रेम किसी के लिए भी सर्वोच्च उपलब्धि है। जैसाकि बतलाया जा चुका है, भगवान् की पूजा की तीन अवस्थाएँ होती हैं—ज्ञान, ज्ञानमयी तथा रति। सुतपा तथा उसकी पत्नी पृश्नि ने ज्ञान के आधार पर भक्ति कार्यों का शुभारम्भ किया था। धीरे धीरे उनमें भगवान् के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ और जब यह प्रेम प्रौढ़ हो चुका तो भगवान् विष्णु रूप में प्रकट हुए। यद्यपि देवकी ने तब उनसे कृष्ण रूप धारण करने की प्रार्थना की थी। भगवान् से अधिक प्रेम करने के लिए हमें कृष्ण या राम रूप में भगवान् की कामना करनी चाहिए। हम कृष्ण के साथ प्रेम का आदान-प्रदान विशेष रूप से कर सकते हैं।
इस युग में हम सभी अधम हैं, किन्तु भगवान्, श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में, हम पर भगवत्प्रेम की वर्षा करने के लिए प्रकट हुए हैं। इसे श्री चैतन्य महाप्रभु के संगी समझते थे। रूप गोस्वामी ने कहा है—

नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदायते।

कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नम: ॥

इस श्लोक में श्री चैतन्य महाप्रभु को महावदान्य अर्थात् सर्वाधिक दानी व्यक्ति कहा गया है क्योंकि वे इतनी आसानी से कृष्ण का दान देते हैं कि हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करने मात्र से मनुष्य कृष्ण-प्राप्ति कर सकता है। अतएव हमें श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रदत्त वर का लाभ उठाना चाहिए और जब हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करने से हम सारे मैल से शुद्ध हो जाँय (चेतोदर्पणमार्जनम् ) तो हम बड़ी आसानी से समझ सकेंगे कि कृष्ण ही एकमात्र प्रेम के लक्ष्य हैं (कीर्तनाद् एव कृष्णस्य मुक्तसंग: परं व्रजेत् )।

अत: मनुष्य को हजारों वर्षों तक घोर तपस्या करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। उसे कृष्ण से प्रेम करना सीखना होता है और उन्हीं की सेवा में सदा लगे रहना होता है (सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यद:)। तभी मनुष्य सरलता से भगवद्धाम वापस जा सकता है। यदि पुत्र रूप में या अन्य रूप में किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए अपने भौतिक कार्य हेतु भगवान् को यहाँ न बुलाकर हम स्वयं भगवद्धाम वापस चले जाते हैं, तो भगवान् के साथ हमारा असली सम्बन्ध प्रकट हो जाएगा और हम शाश्वत सम्बन्ध बनाए रख सकते हैं। हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करके हम धीरे-धीरे परम पुरुष के साथ शाश्वत सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं और हमें स्वरूपसिद्धि प्राप्त हो जाती है। हमें चाहिए कि इस वर का लाभ उठाकर भगवद्धाम वापस जाँय। इसीलिए श्रील नरोत्तमदास ठाकुर ने गाया है—पतितपावनहेतु तव अवतार—श्री चैतन्य महाप्रभु का अवतार हम जैसे पतितात्माओं का उद्धार करने और भगवत्प्रेम प्रदान करने के लिए हुआ। हमें भगवान् के इस महान् वर का लाभ उठाना चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥