श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 40

 
श्लोक
गते मयि युवां लब्ध्वा वरं मत्सद‍ृशं सुतम् ।
ग्राम्यान् भोगानभुञ्जाथां युवां प्राप्तमनोरथौ ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
गते मयि—मेरे चले जाने पर; युवाम्—तुम दोनों को (दम्पतियों को); लब्ध्वा—पाकर; वरम्—वरदान (पुत्र प्राप्ति का); मत्- सदृशम्—मेरी ही तरह के; सुतम्—पुत्र को; ग्राम्यान् भोगान्—भोग-विलास में व्यस्त रहना; अभुञ्जाथाम्—भोग किया; युवाम्—तुम दोनों को; प्राप्त—प्राप्त करके; मनोरथौ—अभिलाषाएँ ।.
 
अनुवाद
 
 जब तुम वर प्राप्त कर चुके और मैं अन्तर्धान हो गया तो तुम मुझ जैसा पुत्र प्राप्त करने के उद्देश्य से विषयभोग में लग गए और मैंने तुम्हारी इच्छा पूरी कर दी।
 
तात्पर्य
 संस्कृत के शब्दकोश अमरकोश के अनुसार विषयी जीवन ग्राम्य धर्म कहलाता है लेकिन आध्यात्मिक जीवन में इस ग्राम्य धर्म को अत्यधिक सराहा नहीं जाता। यदि किसी में भोजन करने, सोने, मैथुन करने तथा रक्षा करने की रंचभर भी लालसा
रहती है, तो वह निष्किञ्चन नहीं रहता। किन्तु मनुष्य को निष्किंचन होना चाहिए। अत: संभोग द्वारा कृष्ण जैसा पुत्र उत्पन्न करने के लिए इच्छा से उसे मुक्त होना चाहिए। इस श्लोक में अपरोक्ष रूप में यही इंगित किया गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥