श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 47

 
श्लोक
ततश्च शौरिर्भगवत्प्रचोदित:
सुतं समादाय स सूतिकागृहात् ।
यदा बहिर्गन्तुमियेष तर्ह्यजा
या योगमायाजनि नन्दजायया ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; च—निस्सन्देह; शौरि:—वसुदेव; भगवत्-प्रचोदित:—भगवान् से आज्ञा पाकर; सुतम्—अपने पुत्र को; समादाय—सावधानी से ले जाकर; स:—उसने; सूतिका-गृहात्—प्रसूतिगृह से, सौरी से; यदा—जब; बहि: गन्तुम्—बाहर जाने के लिए; इयेष—चाहा; तर्हि—तब, उस समय; अजा—न जन्म लेने वाली दिव्य शक्ति; या—जो; योगमाया—योगमाया ने; अजनि—जन्म लिया; नन्द-जायया—नन्द महाराज की पत्नी से ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् भगवान् की प्रेरणा से जब वसुदेव नवजात शिशु को सूतिकागृह से ले जाने वाले थे तो बिलकुल उसी क्षण भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति योगमाया ने महाराज नन्द की पत्नी की पुत्री के रूप में जन्म लिया।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि कृष्ण एक ही समय देवकी के पुत्र तथा यशोदा के पुत्र के रूप में आत्मशक्ति योगमाया के साथ उत्पन्न हुए। देवकी के पुत्र रूप में वे सर्वप्रथम विष्णु रूप में प्रकट हुए और वसुदेव ने अपने पुत्र की पूजा भगवान् विष्णु के रूप में
की क्योंकि वे कृष्ण से शुद्ध स्नेह दिखला पाने की स्थिति में नहीं थे। किन्तु यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को ईश्वर माने बिना ही प्रसन्न रखती थीं। यशोदा के पुत्र तथा देवकी के पुत्र कृष्ण में यही अन्तर है। हरिवंश के प्रमाण पर विश्वनाथ चक्रवर्ती ने यह व्याख्या की है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥