श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 53

 
श्लोक
यशोदा नन्दपत्नी च जातं परमबुध्यत ।
न तल्लिङ्गं परिश्रान्ता निद्रयापगतस्मृति: ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
यशोदा—यशोदा, गोकुल में कृष्ण की माता; नन्द-पत्नी—नन्द महाराज की पत्नी; च—भी; जातम्—उत्पन्न शिशु; परम्—परम पुरुष को; अबुध्यत—समझ गई; न—नहीं; तत्-लिङ्गम्—कि बालक नर है या मादा; परिश्रान्ता—अत्यधिक प्रसव पीड़ा के कारण; निद्रया—नींद के वशीभूत; अपगत-स्मृति:—चेतना खोकर ।.
 
अनुवाद
 
 शिशु जनने की पीड़ा से थककर यशोदा नींद के वशीभूत हो गई और यह नहीं समझ पाईं कि उन्हें लडक़ा हुआ है या लडक़ी।
 
तात्पर्य
 नन्द महाराज तथा वसुदेव घनिष्ठ मित्र थे तथा उनकी पत्नियाँ यशोदा तथा देवकी भी घनिष्ठ मित्र थीं। यद्यपि उनके नाम भिन्न थे, किन्तु एक तरह से वे अभिन्न थीं। अन्तर था तो इतना ही कि देवकी जानती थीं कि भगवान् उनसे जन्मे हैं और अब कृष्ण बन गए हैं, किन्तु यशोदा को यह भी पता नहीं था कि उसे लडक़ा हुआ है या लडक़ी। यशोदा इतनी महान् भक्त थीं कि उन्होंने कृष्ण को कभी भगवान् करके माना ही नहीं। वे तो उन्हें अपने पुत्र की तरह प्यार करती रहीं। किन्तु देवकी शुरू से ही जानती रहीं कि कृष्ण कहने को तो उनके पुत्र हैं, किन्तु हैं भगवान्।
वृन्दावन में कृष्ण को कोई भी व्यक्ति भगवान् नहीं मानता था। जब कृष्ण कोई अनहोनी घटना कर बैठते तो वृन्दावन के सारे वासी—ग्वाले, ग्वालबाल, नन्द महाराज, यशोदा इत्यादि आश्चर्यचकित हो उठते, किन्तु उन्होंने अपने पुत्र को कभी भी भगवान् नहीं माना। कभी-कभी वे यह कहते कि कृष्ण रूप में कोई बड़ा देवता प्रकट हुआ है। भक्ति की ऐसी चरमावस्था में भक्त कृष्ण के पद को भूल जाता है और भगवान् के पद को समझे बिना उनसे प्रगाढ़ प्रेम करता है। यह केवल भक्ति कहलाती है और ज्ञान तथा ज्ञानमयी भक्ति अवस्थाओं से सर्वथा भिन्न होती है।
 
इस तरह श्रीमद्भागवतम् के दसवें स्कंध के अन्तर्गत “कृष्ण जन्म” नामक तृतीय अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥