श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 32: पुन: मिलाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
सभाजयित्वा तमनङ्गदीपनं
सहासलीलेक्षणविभ्रमभ्रुवा ।
संस्पर्शनेनाङ्ककृताङ्‍‍‍‍‍घ्रिहस्तयो:
संस्तुत्य ईषत्कुपिता बभाषिरे ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
सभाजयित्वा—सम्मानित करके; तम्—उसको; अनङ्ग—कामेच्छाओं के; दीपनम्—उद्यीप्त करने वाला; स-हास—हँसते हुए; लीला—क्रीड़ापूर्ण; ईक्षण—चितवन से; विभ्रम—खिलवाड़ करते; भ्रुवा—अपनी भौंहैं से; संस्पर्शनेन—स्पर्श से; अङ्क—अपनी गोदों में; कृत—रख कर; अङ्घ्रि—उनके पाँवों; हस्तयो:—तथा हाथों को; संस्तुत्य—प्रशंसा करके; ईषत्—कुछ कुछ; कुपिता:—क्रुद्ध; बभाषिरे—बोलीं ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीकृष्ण ने गोपियों के भीतर कामवासना जागृत कर दी थी और वे अपनी क्रीड़ापूर्ण हँसी से उनको निहारतीं, अपनी भौंहों से प्रेममय इशारे करतीं तथा अपनी अपनी गोदों में उनके हाथ तथा पाँव रखकर उन्हें मलती हुईं उनका सम्मान करने लगीं। किन्तु उनकी पूजा करते हुए भी वे कुछ कुछ रुष्ट थीं अतएव वे उनसे इस प्रकार बोलीं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥