श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 32: पुन: मिलाप  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
श्रीगोप्य ऊचु:
भजतोऽनुभजन्त्येक एक एतद्विपर्ययम् ।
नोभयांश्च भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साधु भो: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-गोप्य: ऊचु:—गोपियों ने कहा; भजत:—अपना सम्मान करने वालों से; अनु—परस्पर; भजन्ति—आदर करते हैं; एके— कुछ; एके—कुछ; एतत्—इसके; विपर्ययम्—विपरीत; न उभयान्—दोनों से नहीं; च—तथा; भजन्ति—परस्पर प्रशंसा करते हैं; एके—कुछ; एतत्—यह; न:—हमसे; ब्रूहि—बोलिये; साधु—ढंग से; भो:—अरे ।.
 
अनुवाद
 
 गोपियों ने कहा : कुछ लोग केवल उन्हीं से स्नेह जताते हैं, जो उनके प्रति स्नेहिल होते हैं जबकि अन्य लोग उनके प्रति भी स्नेह दिखाते हैं, जो शत्रुवत् या उदासीन होते हैं। फिर भी कुछ लोग किसी से भी स्नेह नहीं जताते। हे कृष्ण, हमसे इस विषय की समुचित व्याख्या करें।
 
तात्पर्य
 विनम्र दिखने वाले इस प्रश्न द्वारा गोपियाँ भगवान् कृष्ण द्वारा उनके प्रेम का समुचित प्रतिदान न करने की बात प्रकट कर देना चाहती थीं। जब कृष्ण ने उन्हें जंगल में छोड़ दिया था, तो वे अत्यधिक विचलित थीं। वे यह जानना चाह रही हैं कि इन प्रेम-व्यापारों में उन्होंने गोपियों को क्यों कष्ट उठाने दिया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥