श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 32: पुन: मिलाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
नाहं तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून्
भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये ।
यथाधनो लब्धधने विनष्टे
तच्चिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अहम्—मैं; तु—दूसरी ओर; सख्य:—हे मित्रो; भजत:—पूजा करते हुए; अपि—भी; जन्तून्—जीवों से; भजामि— आदान-प्रदान करता हूँ; अमीषाम्—उनकी; अनुवृत्ति—लालसा (शुद्ध प्रेम के लिए); वृत्तये—प्रेरित करने के लिए; यथा— जिस तरह; अधन:—निर्धन व्यक्ति; लब्ध—प्राप्त करके; धने—सम्पत्ति; विनष्टे—तथा नष्ट होने पर; तत्—उसका; चिन्तया— उत्सुक विचार से; अन्यत्—अन्य कोई वस्तु; निभृत:—पूरित; न वेद—नहीं जानता ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु हे गोपियो, मैं उन जीवों के प्रति भी तत्क्षण स्नेह प्रदर्शित नहीं कर पाता जो मेरी पूजा करते हैं। इसका कारण यह है कि मैं उनकी प्रेमाभक्ति को प्रगाढ़ करना चाहता हूँ। इससे वे ऐसे निर्धन व्यक्ति के सदृश बन जाते हैं जिसने पहले कुछ सम्पत्ति प्राप्त की थी किन्तु बाद में उसे खो दिया है। इस तरह उसके बारे में वह इतना चिन्तित हो जाता है कि और कुछ सोच ही नहीं पाता।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं—ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् लोग जिस तरह मेरे पास पहुँचते हैं मैं तदनुरूप उनसे प्रेम करता हूँ। फिर भी यदि कोई व्यक्ति भक्तिपूर्वक भगवान् के पास जाता है, तो हो सकता है कि भक्त के प्रेम को तीव्र बनाने के लिए भगवान् तुरन्त उसको प्रेम का पूरी तरह आदान-प्रदान न करें। वस्तुत: भगवान् सचमुच प्रतिदान करते हैं। एक निष्ठावान भक्त सदैव भगवान् से प्रार्थना करता है “कृपया मेरी सहायता करें जिससे मैं शुद्धभाव से आपसे प्रेम कर सकूँ।” इसलिए कृष्ण द्वारा उपेक्षा वास्तव में भक्त की प्रार्थना की पूर्ति होती है। कृष्ण अपने को हमसे विलग करते प्रतीत होते हुए, अपने प्रति हमारे प्रेम को तीव्र बनाते हैं। इसका फल यह होता है कि हम जो चाहते हैं और जिसके लिए प्रार्थना करते हैं उसे अर्थात् परम सत्य कृष्ण के अगाध प्रेम को प्राप्त करते हैं। इस तरह कृष्ण द्वारा की गई प्रतीत होने वाली उपेक्षा वास्तव में उनका विचारपूर्ण प्रतिदान है और हमारी गहनतम तथा शुद्धतम इच्छा की पूर्ति है।

आचार्यों के अनुसार, जब कृष्ण गोपियों से यह श्लोक कहने लगे तो वे एक दूसरे को तिरछी निगाहों से देखने लगीं और अपने मुखों पर आने वाली हँसी को छिपाने का प्रयास करने लगीं। अभी कृष्ण बोल ही रहे थे कि गोपियों को अनुभव होने लगा कि वे उन्हें प्रेमाभक्ति की सर्वोच्च सिद्धि प्रदान कर रहे हैं।

 
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