श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 32: पुन: मिलाप  » 
 
 
 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में वर्णन हुआ है कि श्रीकृष्ण ने किस तरह अपने को गोपियों के मध्य प्रकट किया जो उनसे विछोह के कारण अत्यधिक विक्षुब्ध हो चुकी थीं। जब वे गोपियों को ढाढ़स दे चुके तो उन्होंने गहन आनन्द की अनुभूति व्यक्त की।
जब गोपियाँ कामदेव को भी आकर्षित करने वाले कृष्ण को देखने की तीव्र उत्सुकता को अनेक प्रकार से व्यक्त कर चुकीं तो वे रेशमी पीत वस्त्र पहने और सुन्दर फूलों की माला पहने उनके समक्ष प्रकट हुए। कुछ गोपियाँ उन्हें देखकर आनन्द से इतनी गद्गद हो उठीं कि उन्होंने उनका हाथ पकड़ लिया, कुछ ने अपने कन्धों पर उनका हाथ रख लिया और अन्यों ने उनका जूठा पान खा लिया। इस तरह उन्होंने उनकी सेवा की।

एक गोपी ने कृष्ण के प्रति प्रेममय क्रोध में आकर अपना होंठ काट लिया और स्तब्ध खड़ी रह कर उनको देखती रही। चूँकि गोपियाँ कृष्ण से इतनी आसक्त थीं कि निरन्तर उन्हें ताकते रहकर भी उनकी प्यास शान्त नहीं हुई। एक ने कृष्ण को अपने हृदय के भीतर रख लिया; अपनी आँखें बन्द कीं और अपने भीतर बारम्बार उनका आलिंगन करते हुए दिव्य आनन्द में खो गई मानो कोई योगी हो। इस तरह भगवान् से विलग होने के कारण गोपियों ने जो पीड़ा अनुभव की थी वह दूर हो गई।

इसके बाद कृष्ण अपनी अन्तरंगा शक्ति रूपी गोपियों के संग यमुना के तट पर गये। तब गोपियों ने अपने दुपट्टों से कृष्ण के लिए आसन बना दिया और जब वे बैठ गये तो वे प्रेमयुक्त हाव-भाव द्वारा उनसे आनन्द लेने लगीं। गोपियों को अब भी क्षोभ था कि कृष्ण अन्तर्धान हो गये थे अत: कृष्ण ने उन्हें बताया कि ऐसा उन्होंने क्यों किया। उन्होंने यह भी बताया कि वे उनकी प्रेममयी भक्ति के वशीभूत होकर ही आये हैं और सदैव उनके ऋणी रहेंगे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥