श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 31

 
श्लोक
एवं चेत्तर्हि भोजेन्द्र पुरग्रामव्रजादिषु ।
अनिर्दशान् निर्दशांश्च हनिष्यामोऽद्य वै शिशून् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस तरह; चेत्—यदि ऐसा है; तर्हि—तो; भोज-इन्द्र—हे भोजराज; पुर-ग्राम-व्रज-आदिषु—सारे नगरों, गाँवों तथा चरागाहों में; अनिर्दशान्—दस दिन से कम आयु वाले; निर्दशान् च—तथा जो दस दिन पूरा कर चुके हैं; हनिष्याम:—हम मार डालेंगे; अद्य—आज से; वै—निस्सन्देह; शिशून्—बच्चों को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भोजराज, यदि ऐसी बात है, तो हम आज से उन सारे बालकों को जो पिछले दस या उससे कुछ अधिक दिनों में सारे गाँवों, नगरों तथा चरागाहों में उत्पन्न हुए हैं, मार डालेंगे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥