श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 8

 
श्लोक
तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसु: सुताम् ।
अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृद: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—शिशु को; गृहीत्वा—बलपूर्वक लेकर; चरणयो:—दोनों पाँवों से; जात-मात्राम्—नवजात शिशु को; स्वसु:—अपनी बहन की; सुताम्—कन्या को; अपोथयत्—पछाड़ दिया; शिला-पृष्ठे—पत्थर के ऊपर; स्व-अर्थ-उन्मूलित—विकट स्वार्थ के वशीभूत होकर जड़ से उखाड़ फेंका; सौहृद:—सारे मित्र या पारिवारिक सम्बन्ध ।.
 
अनुवाद
 
 अपने विकट स्वार्थ के कारण अपनी बहन से सारे सम्बन्ध तोड़ते हुए घुटनों के बल बैठे कंस ने नवजात शिशु के पाँवों को पकड़ा और उसे पत्थर पर पटकना चाहा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥