श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 42: यज्ञ के धनुष का टूटना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
अथ तान्दुरभिप्रायान् विलोक्य बलकेशवौ ।
क्रुद्धौ धन्वन आदाय शकले तांश्च जघ्नतु: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; तान्—उनको; दुरभिप्रायान्—दुष्ट अभिप्राय वाले; विलोक्य—देखकर; बल-केशवौ—बलराम तथा कृष्ण ने; क्रुद्धौ—क्रुद्ध; धन्वन:—धनुष के; आदाय—लेकर; शकले—दोनों टूटे खंड; तान्—उनको; च—तथा; जघ्नतु:—प्रहार किया ।.
 
अनुवाद
 
 दुर्भावना से रक्षकों को अपनी ओर आते देखकर बलराम तथा कृष्ण ने धनुष के दोनों खण्डों को अपने हाथों में ले लिया और वे उन सबों को इन्हीं से मारने लगे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥