श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 10

 
श्लोक
न सभां प्रविशेत् प्राज्ञ: सभ्यदोषाननुस्मरन् ।
अब्रुवन् विब्रुवन्नज्ञो नर: किल्बिषमश्न‍ुते ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; सभाम्—सभा में; प्रविशेत्—प्रवेश करे; प्राज्ञ:—चतुर व्यक्ति; सभ्य—सभा के सदस्यों की; दोषान्—पापपूर्ण त्रुटियों को; अनुस्मरन्—मन में लाते हुए; अब्रुवन्—न बोलते हुए; विब्रुवन्—गलत बोलते हुए; अज्ञ:—अज्ञानी (या बनने वाला); नर:—मनुष्य; किल्बिषम्—पाप; अश्नुते—करता है ।.
 
अनुवाद
 
 बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि यदि वह जान ले कि किसी सभा के सभासद अनुचित कार्य कर रहे हैं, तो वह उस सभा में प्रवेश न करे। और यदि ऐसी सभा में प्रवेश कर लेने पर वह सत्यभाषण करने से चूक जाता है, या मिथ्या भाषण करता है या अज्ञानता की दुहाई देता है, तो वह निश्चित ही पाप का भागी बनता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥