श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 11

 
श्लोक
वल्गत: शत्रुमभित: कृष्णस्य वदनाम्बुजम् ।
वीक्ष्यतां श्रमवार्युप्तं पद्मकोशमिवाम्बुभि: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
वल्गत:—कूदते हुए; शत्रुम्—अपने शत्रु को; अभित:—चारों ओर; कृष्णस्य—कृष्ण का; वदन—मुख; अम्बुजम्— कमलवत्; वीक्ष्यताम्—जरा देखो तो; श्रम—थकान के; वारि—जल से; उप्तम्—आच्छादित; पद्म—कमल के फूल के; कोशम्—दलपुंज; इव—सदृश; अम्बुभि:—जल की बूँदों से ।.
 
अनुवाद
 
 अपने शत्रु के चारों ओर उछलते-कूदते कृष्ण के कमलमुख को तो जरा देखो! भीषण लड़ाई लडऩे से आये हुए पसीने की बूँदों से ढका यह मुख ओस से आच्छादित कमल जैसा लग रहा है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥