श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 15

 
श्लोक
या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्योधन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
या:—जो (गोपियाँ); दोहने—दुहते समय; अवहनने—कूटते; मथन—मथते हुए; उपलेप—लेप करते; प्रेङ्ख—झूलों पर; इङ्खन—झूलते; अर्भ-रुदित—रोते शिशुओं (की देखभाल करते); उक्षण—छिडक़ते; मार्जन—धोते हुए; आदौ—इत्यादि; गायन्ति—गाती हैं; च—तथा; एनम्—उससे; अनुरक्त—अत्यधिक अनुरक्त; धिय:—मन; अश्रु—अश्रु सहित; कण्ठ्य:—गले; धन्या:—भाग्यशाली; व्रज-स्त्रिय:—व्रज की स्त्रियाँ; उरुक्रम—कृष्ण की; चित्त—चेतना से; याना:—इच्छित की प्राप्ति ।.
 
अनुवाद
 
 व्रज की स्त्रियाँ परम भाग्यशाली हैं क्योंकि कृष्ण के प्रति पूर्णतया अनुरक्त चित्तों से तथा अश्रुओं से सदैव अवरुद्ध कण्ठों से वे गौवें दुहते, अनाज कूटते, मक्खन मथते, ईंधन के लिए गोबर एकत्र करते, झूलों पर झूलते, अपने रोते बालकों की देखरेख करते, फर्श पर जल छिडक़ते, अपने घरों को बुहारते इत्यादि के समय निरन्तर उनके गुणों का गान करती हैं। अपनी उच्च कृष्ण-चेतना के कारण वे समस्त वाँछित वस्तुएँ स्वत: प्राप्त कर लेती हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥