श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 18

 
श्लोक
सभया: स्त्रीगिर: श्रुत्वा पुत्रस्‍नेहशुचातुरौ ।
पितरावन्वतप्येतां पुत्रयोरबुधौ बलम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
स-भया:—भयभीत; स्त्री—स्त्रियों के; गिर:—शब्द; श्रुत्वा—सुनकर; पुत्र—अपने पुत्रों के; स्नेह—स्नेह से; शुच—शोक से; आतुरौ—विह्वल; पितरौ—उनके माता-पिता (देवकी तथा वसुदेव); अन्वतप्येताम्—सन्ताप का अनुभव करते; पुत्रयो:—अपने दोनों पुत्रों के; अबुधौ—न जानते हुए; बलम्—बल को ।.
 
अनुवाद
 
 दोनों भगवानों पर स्नेह होने के कारण उनके माता-पिता (देवकी तथा वसुदेव) ने जब स्त्रियों के भयपूर्ण वचन सुने तो वे शोक से विह्वल हो उठे। वे अपने पुत्रों के बल को न जानने के कारण सन्तप्त हो गए।
 
तात्पर्य
 इस परिस्थिति में स्वाभाविक था, कृष्ण के माता-पिता द्वारा यह सोच रहे थे कि “हमने अपने पुत्रों को घर में
क्यों नहीं रखा? हमने उन्हें इस भ्रष्ट प्रदर्शन में भाग लेने की अनुमति क्यों दी” पश्चाताप करने लगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥