श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 2

 
श्लोक
हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद्ध्वा पद्‌भ्यामेव च पादयो: ।
विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
हस्ताभ्याम्—हाथों से; हस्तयो:—हाथों द्वारा; बद्ध्वा—पकडक़र; पद्भ्याम्—पाँवों से; एव च—भी; पादयो:—अपने पैरों से; विचकर्षतु:—वे घसीटने लगे (कृष्ण चाणूर को तथा बलराम मुष्टिक को); अन्योन्यम्—एक-दूसरे को; प्रसह्य—बलपूर्वक; विजिगीषया—विजय की इच्छा से ।.
 
अनुवाद
 
 एक-दूसरे के हाथों को पकड़ कर और एक-दूसरे के पाँवों को फँसा कर ये प्रतिद्वन्द्वी विजय की अभिलाषा से बलपूर्वक संघर्ष करने लगे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥