श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 20

 
श्लोक
भगवद्गात्रनिष्पातैर्वज्रनीष्पेषनिष्ठुरै: ।
चाणूरो भज्यमानाङ्गो मुहुर्ग्लानिमवाप ह ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
भगवत्—भगवान् का; गात्र—अंगों द्वारा; निष्पातै:—वारों से; वज्र—वज्र के; निष्पेष—धमाके की तरह; निष्ठुरै:—कठोर; चाणूर:—चाणूर; भज्यमान—भंग किया गया; अङ्ग:—सारा शरीर; मुहु:—अधिकाधिक; ग्लानिम्—पीड़ा तथा थकान; अवाप ह—अनुभव किया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के अंगों से होने वाले कठोर वार चाणूर पर वज्रपात सदृश लग रहे थे जिससे उसके शरीर का अंग-प्रत्यंग चूर हो रहे थे और उसे अधिकाधिक पीड़ा तथा थकान उत्पन्न हो रही थी।
 
तात्पर्य
 चाणूर की कुहनियाँ, भुजाएँ, घुटने तथा
अन्य भाग निर्बल होते जा रहे थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥