श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 27

 
श्लोक
तर्ह्येव हि शल: कृष्णप्रपदाहतशीर्षक: ।
द्विधा विदीर्णस्तोशलक उभावपि निपेततु: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तर्हि एव—और तब; हि—निस्सन्देह; शल:—शल नामक मल्ल; कृष्ण—कृष्ण के; प्रपद—अँगूठे से; आहत—चोट खाकर; शीर्षक:—उसका सिर; द्विधा—दो टूक; विदीर्न:—फटा हुआ; तोशलक—तोशल; उभौ अपि—दोनों ही; निपेततु:—गिर पड़े ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् कृष्ण ने अपने पाँव के अँगूठों से शल पहलवान के सिर पर प्रहार करके उसे दो फाड़ कर दिया। भगवान् ने तोशल के साथ भी इसी तरह किया और वे दोनों मल्ल धराशायी हो गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥