श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 29

 
श्लोक
गोपान्वयस्यानाकृष्य तै: संसृज्य विजह्रतु: ।
वाद्यमानेषु तूर्येषु वल्गन्तौ रुतनूपुरौ ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
गोपान्—ग्वालबाल; वयस्यान्—उनके वयस्क मित्रगण; आकृष्य—एकत्र करके; तै:—उनके साथ; संसृज्य—मिलकर; विजह्रतु:—खेला-कूदा; वाद्यमानेषु—बजाते हुए; तूर्येषु—तुरहियों में; वल्गन्तौ—दोनों नाचते हुए; रुत—प्रतिध्वनित करते हुए; नूपुरौ—अपने घुंघरू ।.
 
अनुवाद
 
 तब कृष्ण तथा बलराम ने अपने समवयस्क ग्वालबाल सखाओं को अपने पास बुलाया और उनके साथ दोनों भगवानों ने खूब नाच किया और खेला। उनके घुंघरू वाद्य-यंत्रों की भान्ति ध्वनि करने लगे।
 
तात्पर्य
 आजकल हम देखते हैं कि मुक्केबाजी-प्रतियोगिता में ज्योंही विजय की घोषणा की जाती है, विजयी मुक्केबाज के सभी मित्र तथा सम्बन्धी उसे बधाई देने के लिए उसके पास दौड़े
आते हैं और प्राय: विजयी व्यक्ति परम हर्ष से नाचने लगता है। ठीक ऐसे ही कृष्ण तथा बलराम अपनी विजय मनाते हुए अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ मिलकर खूब नाचे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥